किसके निशाने पर सिद्धू
अमृतसर. पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार के गठन के बाद सांसद नवजोत सिंह सिद्धू को डिप्टी सीएम बनाने का मामला क्या उठा, सिद्धू अपने राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर आ गए। कई मामलों में उपेक्षा झेल चुके सिद्धू लगातार विवादों में चल रहे हैं। कभी अकाली दल उन्हें कटघरे में खड़ा कर देता है, तो कभी भाजपा वाले ही हाशिये पर पहुंचा देते हैं।
विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, डिप्टी सीएम सुखबीर बादल और सांसद सिद्धू की अच्छी ट्यूनिंग रही, परंतु चुनाव के बाद सिद्धू का नाम बतौर डिप्टी सीएम उछलना न तो अकाली दल और न ही भाजपा का गंवारा हुआ। नतीजा अपनी ही सरकार से हक लेने के लिए सिद्धू को संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना पड़ा।
सीएम द्वारा अमृतसर को अढ़ाई सौ करोड़ देने की घोषणा के बावजूद उसमें से सौ करोड़ लेने के लिए सिद्धू को रोष धरने पर बैठने की धमकी देनी पड़ी। विधानसभा चुनाव में अमृतसर डिवेल्पमैंट अथारिटी (एडीए) बनाने और उसका चेयरमैन सिद्धू को बनाने का मंचों से दम भरा गया, परंतु चुनाव के बाद एडीए तो बनी, पर उसका चेयरमैन मुख्यमंत्री को बना दिया गया।
एडीए में सदस्य के तौर पर भी सिद्धू को नहीं लिया गया। अभी तक के अढ़ाई सालों की बात करें तो सिद्धू को लगातार किसी न किसी विवाद में उलझाकर रखा गया है। चाहे वह नगर सुधार ट्रस्ट की चेयरमैनी का विवाद हो या एसएसपी कुंवर विजय प्रताप सिंह के तबादले का। दोनों ही मामलों में सिद्धू को मुंह की खानी पड़ी। छीना को ट्रस्ट की चेयरमैनी से तो वह उतारने में सफल रहे, परंतु जिन मामलों को लेकर उन्होंने छीना को घेरा था।
उसे दरकिनार करते हुए हाईकमान ने छीना को उससे भी बड़ी पंजाब लघु उद्योग व निर्यात निगम की चेयरमैनी से नवाज दिया। एसएसपी कुंवर के मामले को लेकर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के दरबार में पहुंचे सिद्धू को उन्होंने कोरा जवाब देते हुए मना कर दिया गया। दोनों ही मामलों में स्थानीय निकायमंत्री मनोरंजन कालिया की लॉबी हावी रही।
भाजपा से अलग-थलग
नवजोत सिद्धू को पार्टी से अलग-थलग करने के प्रयासों में स्थानीय निकायमंत्री कालिया धड़ा कामयाब होता जा रहा है। चेयरमैनी और एसएसपी मामले में अपनी मनवाने के बाद सिद्धू को शहर में अलग थलग करने के प्रयास में भी वह कामयाब रहा है। कालिया धड़ा शहर में सिद्धू को आमद को कोई मान्यता नहीं देता, जबकि अब सिद्धू खेमे के नेता भी पांच मॉल रोड पर कम ही दिखाई देते हैं।
जो नेता दिखते भी है, उनमें से चंद नेताओं को छोड़कर ज्यादातर को बतौर भाजपा के टकसाली वर्कर मान्यता ही नहीं है। सिद्धू खेमे से जुड़ी भाजपा जिला शाखा भी उनके पक्ष में नेताओं को लामबंद करने में असफल रही है।










