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Thursday, Nov 19th, 2009, 2:52 am [IST]  

danik bhaskarएसडी स्कूल में पसारे स्वाइन फ्लू ने पांव

Bhaskar Correspondent

ambalaअम्बाला. शहर में स्वाइन फ्लू का असर जारी है। नए मामले में छावनी एसडी पब्लिक स्कूल में दो छात्राओं में स्वाइन फ्लू पाजिटिव की पुष्टि हुई और दो अन्य छात्राओं में बीमारी के लक्ष्ण देख आब्जर्वेशन में रखा गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए अन्य विद्यार्थियों का निरीक्षण किया गया और स्कूल को तुरंत प्रभाव से 25 नवंबर तक बंद कर दिया गया है।



उक्त स्कूल में बुधवार को एकाएक चिंताभरा माहौल बन गया, जब यहां आठवीं में पढ़ने वाली दो छात्राओं राधिका व रवनीत कौर में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई। हाउसिंग बोर्ड कालोनी निवासी राधिका को कई दिन से बुखार था। अभिभावकों ने अपने स्तर पर टेस्ट कराया, तो फ्लू पाजिटिव पाया गया।



दूसरी छात्रा रवनीत को किसी खांसी,बुखार की शिकायत नहीं थी। चूंकि यह पाजिटिव पाई गई राधिका के साथा साथ रहती थी, इसलिए टेस्ट करा लिया गया। इसमें भी पाजिटिव होने की पुष्टि सिविल अस्तपाल द्वारा की गई। जानकारी में मामला आया तो आठवीं कक्षा की ही समीक्षा और सोनाली में भी स्वाइन फ्लू के लक्ष्णों का संदेह हुआ।



छात्राओं को आवश्यक उपचार के बाद अस्तपाल से घर भेज दिया गया है। स्कूल प्रिंसिपल नीलक्ष्ंद्र जीत संधू ने तुरंत विशेष मीटिंग बुलाकर स्टाफ व अभिभावकों से बातचीत की और एहतियात बरतने के बारे में बताया। सभी स्टूडेंटस को छुट्टियों के सकरुलर के साथ स्वाइन फ्लू से बचाव का चार्ट साथ ले जाना अनिवार्य किया। उधर शिक्षा विभाग ने अन्य स्कूलों में अवकाश करने के बारे कोई फैसला नहीं लिया है।



खुल गए ताले और बैठ गई टीम



आखिर स्वाइन फ्लू के लिए बनाए गए आइसोलेशन वार्ड पर लटके तालों को एडीसी सुमेधा कटारिया की फटकार के बाद खोल दिया गया है। साथ ही संबंधित डाक्टरों की टीम भी वार्ड में बैठ गई है। इसके अलावा एडीसी ने नवनिर्मित ट्रामा सेंटर में बने एंबुलेंस सिस्टम को भी चैक किया।



करीब आधे घंटे की औचक कार्रवाई के बाद एडीसी लौट गई। बता दें कि जिले में स्वाइन फ्लू की दस्तक के बाद दैनिक भास्कर ने नवनिर्मित ट्रामा सेंटर में बने आइसोलेशन वार्ड की स्थिति का उल्लेख किया था। जहां आइसोलेशन वार्ड के एक कमरे पर ताला लटका हुआ था जबकि दूसरा कमरा भी बंद था।



कैसे—कैसे मास्क



सर्जिकल मास्क : चार माइक्रोन से छोटे कणों को नहीं रोक पाता। आम तौर पर अस्पतालों में इस्तेमाल होता है। सामान्य वायरस रोक सकता है।



फायदा : सांस लेने में सही है। बच्चों से लेकर बड़े तक सभी पहन सकते हैं।



कमी : हर चार घंटे के लगातार इस्तेमाल के बाद बदलना पड़ता है। स्वाइन फ्लू में उपयुक्त नहीं।



पेपर मास्क : मामूली वायरसों को रोक सकता है, लेकिन पांच माइक्रोन से छोटे कणों को नहीं रोक सकता। सांस लेने में सामान्य है।



फायदा : कफ और कोल्ड में बेहतर है। अगर कम इस्तेमाल किया जाए तो यह अच्छा है, लेकिन स्वाइन फ्लू में उपयुक्त नहीं है।



कमी : पहनने के बाद नाक से आने वाली सांस के कारण जल्द गीला होकर खराब हो जाता है।



एन 95 : इलेक्ट्रैकिली स्टैटिक मैटेरियल से तैयार यह मास्क तीन माइक्रोन तक के छोटे कणों और वायरसों को रोक लेता है। यह टीबी के वायरसों को भी रोक सकता है।



फायदा : पॉली प्रॉपलीन फाइबर से तैयार किया जाता है। ये नॉन वूवन तकनीक से बनाया जाता है।



कमी : सांस लेने में तकलीफ महसूस हो सकती है। बच्चों का चेहरा और मुंह पूरा नहीं ढंक पाता है।



स्वाइन फ्लू से जीती जिंदगी की जंग



जब हम बॉबे से वापस लौट रहे थे तो हमारी दो माह की बेटी वेश्वनी को बुखार था। अम्बाला पहुंचने पर उसे बुखार के साथ-साथ जुकाम और खांसी होने लगी। फिर वह बेटी को लेकर चैक कराने सिविल अस्पताल पहुंचे। जहां चिकित्सकों ने बेटी की तबीयत देखने के बाद उनसे पूरी जानकारी मांगी। बताने पर चिकित्सकों ने बेटी को स्वाइन फ्लू की आशंका बताई। बीमारी का नाम सुनते ही उनके हाथ-पांव फूल गए और उन्होंने अपनी नजदीकी रिश्तेदारों को तुरंत सिविल अस्पताल बुला लिया। एक पल के लिए तो वह सभी घबरा गए थे।



धैर्य और हिम्मत के साथ लिया काम



फिर मन को पक्का करने के बाद उन्होंने डाक्टरों से जल्द बेटी का उपचार शुरू करने के लिए कहा। तभी डाक्टरों ने बेटी को आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कर लिया। इलाज शुरू करने से पहले डाक्टरों ने बेटी के स्वैब सेंपल लिए और उन्हें जांच के लिए लैब भेज दिया। साथ ही उन्हें एहतियात बरतने के लिए कहा।



फिर हमने भी लगा लिए मास्क



बेटी को स्वाइन फ्लू की आशंका के बाद हमने भी मास्क पहन लिए थे। साथ ही हर तरह की सावधानी बरती। किसी को आइसोलेशन वार्ड के भीतर नहीं जाने दिया। इसके अलावा खाना खाने से पहले व बाद में हाथ धोना, एक-दूसरे के कपड़ों को इस्तेमाल न करना। लेकिन इस बीच हमारे मन में पता नहीं क्या-क्या गलत ख्याल आए।



मगर एक-दूसरे को दिलासा देते रहे और भगवान से जल्द बेटी के स्वस्थ होने की कामना करते रहे। जब दो दिन बाद डाक्टर ने बेटी के स्वस्थ होने का समाचार दिया और दोबारा टेस्ट कराने पर रिपोर्ट ठीक आई तो उन्होंने सबसे पहले भगवान का शुक्रिया अदा किया। वह तो खुश थे ही उनके रिश्तेदारों की भी खुशी का ठिकाना नहीं था।

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