ओबामाओ होते ही की हदें पार
भास्कर विश्लेषणः शंघाई के पोस्टरों में ओबामा को माओ के साथ जोड़कर ओबामाओ लिखा गया। क्या ऐसे स्वागत से प्रभावित होकर वे भारत-पाक मुद्दे पर चीनी भाषा बोल बैठे?
पहला दिन
अमेरिकी राष्ट्रपति रविवार शंघाई पहुचे। सोमवार को उन्होंने पब्लिक डिप्लोमेसी की अपनी स्टाइल के तहत शंघाई में युवाओं से चर्चा की। बातों से उन्होंने चीनी छात्राआंे को अपना फैन बना लिया।
ओबामा के मंत्र और मायने
—इंटरनेट की बेरोक-टोक पहुंच ने अमेरिका को मजबूत बनाया
मायने : इंटरनेट से पाबंदी हटाने के लिए सरकार पर दबाव डालो।
—बोलने की आजादी ने मुझे बेहतर नेता बनाया
मायने : आपके यहां बोलने की आजादी नहीं, आपके नेता कैसे हैं, आप जानें।
—सूचना के खुलेपन से लोग जागरूक होते हैं। सरकार से जवाब मांग सकते हैं।
मायने : साम्यवादी व्यवस्था के कारण बोलने की आजादी पर रोक है।
—हमारे यहां सरकार की कड़ी आलोचना की जाती है। इससे मैं सीखता हूं।
मायने : चीन के नेताओं के लिए सीखने की गुंजाइश नहीं है।
दूसरा दिन
डाल-डाल, पात-पात
बीजिंग में ढाई घंटे की बातचीत के बाद ओबामा और चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओं से प्रेस कांफ्रेंस में अपने-अपने मुद्दों पर जोर देते नजर आए :
हू : हमें घरेलू उद्योग-व्यापार को संरक्षण देने का विरोध करना चाहिए।
मायने : व्यापार में घरेलू उद्योग-व्यापार को बचाने की अमेरिकी तरकीबें नहीं चलेंगी।
ओबामा : तिब्बत, चीन का अंग है। हम चीनी सरकार व दलाई लामा में बातचीत चाहते हैं।
मायने : तिब्बत पर रियायत दी है, अब आर्थिक मोर्चे पर जेब ढीली करे चीन। दलाई लामा के जिक्र से मसला खत्म न होने का दिया संकेत।
ओबामा : संयुक्त बयान में भारत-पाक रिश्तों को सुधारने का संकल्प जताया।
मायने : चीन यदि दक्षिण एशिया में सक्रियता दिखाए तो अमेरिका को आपत्ति नहीं होगी।
तीसरा दिन
खोखली बातें - ओबामा ने बुधववार को प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से चर्चा की। व्यापार घाटे की ओबामा की शिकायत पर आर्थिक मामलों के सर्वेसर्वा वेन ने कहा कि खुला व्यापार व निवेश होने दो सब ठीक हो जाएगा। दोनों ने बातें तो बड़ी-बड़ी की लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हुआ। इसके बाद ओबामा चीन की महान दीवार देखने गए, प्राचीन वास्तुकला की जैसी तारीफ की जाती है, वैसी की और दक्षिण कोरिया उड़ गए।
क्यों ले आए पाक का मुद्दा?
ओबामा ने भारत पाक में तनाव दूर करने की बात कहकर चीन को इस मामले में चौधराहट सौंप दी।
तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप का विरोध करने वाले भारत का चीन से सीमा विवाद है। वह कैसे मध्यस्थता कर सकता है। इसीलिए विदेश मंत्रालय ने इतनी तीखी प्रतिक्रिया जताई है।
ऐसा क्यों कहा होगा?
* अमेरिकी राष्ट्रपति अपने बयान से उठने वाले बवंडर को भांप न सके हों।
* चीन जाकर उसके सुर में सुर मिलाने की गलती कर गए हों
* प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा के ठीक पहले परमाणु अप्रसार जैसे मसलों पर दबाव डालने की कूटनीति भी संभव।



