विरासत की धुन शहर में
जयपुर. बदलते दौर के साथ बॉलीवुड का संगीत भले ही पश्चिमी सुरों पर सुनने वालों के दिलों को छूने का भ्रम पाल रहा हो, लेकिन आज भी लोग पुराने दौर के गीत—संगीत को सुनना पसंद कर रहे हैं।
इसी की बानगी है कि पिछले कुछ महीनों में मन्ना डे, शारदा और मुबारक बेगम जैसी आवाजों के लाइव शो हुए और उनको सुनने बड़ी संख्या में सुरीले संगीत के मुरीद पहुंचे। इसके साथ वक्त की रफ्तार के साथ चलने वाले एफएम रेडियो भी कुछ घंटों के स्लॉट ऐसे ही पुराने गीत संगीत को जिंदा रखने के लिए रख रहे हैं और इनको भी बहुत सुना जा रहा है।
इससे यह साबित होता है कि शहर के लोग आज भी पुराने दौर के संगीत को उतनी ही तवज्जो और इज्जत देते हैं जितनी शायद पहले मिला करती थी। अगर पिछले दो सालों पर नजर डालें तो राहत फतेह अली खान, सुनिधि चौहान, शान, श्रेया घोषाल, कुणाल गांजावाला जैसे नई पीढ़ी के बॉलीवुड सिंगर्स ने परफॉर्मेस दी। वहीं इस साल इवेंट मैनेजर्स ने उनकी जगह पुराने दौर की आवाजों को तरजीह दी।
इंडिया मनोरंजन के ललित टंडन कहते हैं, ऐसा नहीं है कि केवल जयपुर में ही लीजैंड सिंगर्स को सुना जा रहा है बल्कि इनकी दीवानगी पूरे भारत में देखी जा रही है। यह बात बिल्कुल ठीक है कि अब जो भी फिल्मी म्यूजिक आ रहा है वह उतना मैलोडियस नहीं है।
यही वजह है कि मन्ना डे, शारदा जैसी आवाजों को फिर से याद किया जा रहा है। यह जानते हुए कि उनकी आवाज में अब उम्रदराज होने की वजह से वैसी खनक नहीं रही है, लेकिन बावजूद इसके उनके गले से सदाबहार गीतों को सुनने का जुनून कम नहीं हो रहा है। इसमें एक और बात जो काबिले गौर है वह यह कि इन कार्यक्रमों में सुरीला संगीत समझने और सुनने वालों में युवा श्रोताओं की भी बड़ी संख्या होती है।
म्यूजिक कम्पोजर अशोक मुखर्जी कहते हैं कि समझदार श्रोता जानते हैं कि रूह को छू जाने वाले गीतों को कोई नई आवाज गाए तो वह उन गीतों को सुर में तो गा सकता है, लेकिन उसकी आत्मा को नहीं गा पाएगा।
पुराने संगीत के कद्रदान और उन गीतों का बड़ा कलैक्शन रखने वाले डालेन्द्र तिवाड़ी कहते हैं कि यह शहर के सुरीले मिजाज को भी दर्शाता है जिस वजह से यहां उस दौर के संगीत को सुना जा रहा है। इसके साथ ही एफएम रेडियो चैनल्स में भी एक प्रोग्राम उन गीतों का होता है। इससे भी साबित होता है कि अब शहर में विरासत का संगीत गूंज रहा है।










