सुपरफास्ट ट्रेनें सिर्फ नाम की
बिलासपुर. न स्पीड बढ़ी, न स्टापेज घटा फिर भी मिल गया सुपर फास्ट का दर्जा। जोन से गुजरने वाली आधा दर्जन ट्रेनों का यही हाल है, जिसमें सफर करने के लिए यात्रियों को नाम के लिए 10 से 20 रुपए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
रेल के किराए में पिछले छह साल के भीतर एक रुपए की वृद्घि नहीं हुई। इस बात में जितनी सच्चई है, उतनी ही इसमें भी है कि रनिंग बढ़ाने के लिए ट्रेनों का दर्जा बढ़ा दिया गया। एक तरह से रेलवे ने आय अर्जित करने के लिए सारा भार चुनिंदा ट्रेनों के यात्रियों पर डाल दिया। इस फंडे को यहां से गुजरने वाली ट्रेनों की स्थिति से समझा जा सकता है।
बोर्ड ने वर्ष 2008-2009 में अहमदाबाद, अमरकंटक, गोंडवाना एक्सप्रेस को सुपरफास्ट का दर्जा दिया। एक्सप्रेस से सुपरफास्ट में तब्दील होने से स्टापेज और सफर के समय में कमी आने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। तीनों ट्रेनें बिलासपुर-रायपुर के बीच आज भी उन्हीं स्टेशनों में ठहर रही हैं, जहां पहले ठहरा करती थीं।
इसके अलावा ट्रेनों को 111 किलोमीटर की दूरी तय करने में पहले जितना ही समय लग रहा है। अब बदलाव पर नजर डालें तो ट्रेनों के किराए में ही बदलाव हुआ है। एक्सप्रेस से सुपरफास्ट बनी ट्रेनों में सफर करने के लिए यात्रियों को दस से 20 रुपए अतिरिक्त देना पड़ रहा है। ऐसे में समझा जा सकता है कि यात्री ठगे जा रहे हैं और रेलवे की आय बढ़ गई।
किराए के साथ समय भी ज्यादा
किराया बढ़ने से यही माना जाता है कि ट्रेन की गति बढ़ेगी और समय कम लगेगा। जोन से गुजरने वाली ट्रेनों की स्थिति बिलकुल उल्टी है। यहां सुपरफास्ट की अपेक्षा एक्सप्रेस ट्रेनें तेज गति से चल रही हैं। सुपरफास्ट अमरकंटक को बिलासपुर से रायपुर पहुंचने में 1 घंटा 55 मिनट लगते हैं, जबकि गोरखपुर एक्सप्रेस 1 घंटे 35 मिनट में सफर पूरी करती है। स्थिति स्पष्ट है कि जोन के यात्रियों को सफर के लिए राशि और समय दोनों ही ज्यादा खर्च करनी पड़ रहा है।










