Thursday, Nov 19th, 2009, 7:31 am [IST]  

danik bhaskarअब गरमाएगी भिलाई निगम की राजनीति

भास्कर न्यूज

भिलाई. विपक्ष के विरोध के बावजूद संख्या बल के दम पर सामान्य सभा में प्रस्ताव पास करा लेने वाले महापौर विद्यारतन भसीन की राह अब आसान नहीं रह गई है। उन्हें पहले ही असंतुष्ट पार्षदों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा था। नई एमआईसी में तवज्जो नहीं मिलने से अब सत्तापक्ष के कुछ और लोग उनसे दूरी बना सकते हैं।



महापौर विपक्ष नहीं बल्कि अपने ही दल के कुछ पार्षदों की कार्यप्रणाली से परेशान हैं। विपक्ष के पाषर्द तो केवल सामान्य सभा में ही हल्ला बोलते हैं, लेकिन सत्तापक्ष के पार्षद आए दिन उलझन में डालते रहे हैं। कभी कोई सदस्य अधिकारी के साथ भिड़ जाता है तो कभी कोई ठेके में अड़ंगा डालता है।



सामान्य सभा में वे विपक्ष की भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि एमआईसी मेंबर खुद ही अपने विभागों का प्रश्न करते थे। अपने ही नेतृत्व को उलझाने में वे कोई कसर नहीं छोड़ते। इससे सत्तापक्ष की किरकिरी होती है। ऐसे समय में महापौर का कुछ लोगों को अपनी टीम से बाहर का रास्ता दिखाना विरोध को और हवा दे सकता है। महापौर ने जिन लोगों पर अविश्वास जताया है वे तो उनके स्वभाविक विरोधी हो ही गए हैं। पहले से कद घटने या अपने भरोसे का नहीं मानने से कुछ और पार्षदों की नाराजगी भी अब उन्हें झेलनी पड़ सकती है।



जिस तरह पहले से तनातनी चल रही है, ऐसे में अब सत्ताधारी दल के पार्षद खुलकर बगावती तेवर पर उतर आए तो कोई आश्चर्य नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि महापौर ने पार्टी और नेतृत्व पर आस्था व सहयोग करने वालों को अपनी कौंसिल में स्थान दिया है। बताया जाता है कि पार्टी के शीर्ष नेताओं और संगठन को पूरा विश्वास में लेने के बाद ही महापौर ने अपनी टीम बनाई है। वे निश्चित ही महापौर और पार्टी के प्रति पूरी वफादारी निभाएंगे फिर भी निगम में दलीय आंकड़े और वैशाली नगर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम के बाद बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियां महापौर के काफी विपरीत हैं। निगम क्षेत्र के तीनों विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेसी विधायक हैं। भिलाई शहर और दुर्ग ग्रामीण में तो पहले से ही कांग्रेस का कब्जा था।



एकमात्र वैशाली नगर भाजपा के कब्जे में था उसे भी उपचुनाव में कांग्रेस ने झटक लिया। ऐसे में कांग्रेसी पार्षदों का आत्मबल बढ़ा है। सत्तापक्ष के सिर पर अब पहले की तरह राजनीतिक संरक्षण नहीं होने का पूरा फायदा कांग्रेसी पार्षद उठाएंगे। जहां तक संख्या बल की बात है बहुमत होने के बाद भी पिछले कुछ सामान्य सभा की बैठकों में सत्तापक्ष को अपना ही प्रस्ताव पास कराने में काफी दिक्कतें हुई है।



भाजपा के दर्जनभर पार्षद हैं असंतुष्ट



निगम में कुल 67 वार्ड हैं। इनमें से 33 वार्डो में भाजपा पार्षद निर्वाचित हुए थे। 8 निर्दलीय पार्षदों के समर्थन के बाद उनकी संख्या 41 थी। इनमें से एक सुशीला देवी शुक्ला के निधन के बाद फिलहाल सदन में उनकी संख्या 40 है। इसी तरह कांग्रेस के 22 पार्षद निर्वाचित हुए थे और 4 निर्दलीय पार्षदों सहित निगम में कुल 26 कांग्रेसी पार्षद हैं। इनमें से राजेंद्र अरोरा पद से हटा दिए गए हैं।



शिव मानकर ने इस्तीफा दे दिया है और रीति देशलहरा कांग्रेस छोड़कर छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच में शामिल हो गई हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्षदों की संख्या 23 रह गई है। जहां तक भाजपा में असंतुष्टों की बात है लगभग दर्जनभर हैं। ऐसे में निगम में सत्तापक्ष को मुश्किल का भी सामना करना पड़ सकता है। इस समय निगम में नीता लोधी के कार्यकाल जैसी स्थिति हो गई है, जब कांग्रेस के ही पार्षद अपने प्रस्ताव का विरोध करते थे और विपक्ष के मनमाफिक प्रस्ताव पारित हो जाते थे।

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