जमीनी परेशानी, हवाई योजना
शिमला. शिमला कोर्ट का डंडा चलने के बाद नगर निगम ने तीन माह में सात पार्किग बनाने का अपना पक्ष तो रख दिया है, लेकिन हकीकत यह है कि जमीनी तैयारी कहीं नजर नहीं आ रही। एक भी प्रोजेक्ट अभी तक प्रारंभिक चरण पूरा नहीं कर पाया है।
पार्किग निर्माण को लेकर हाईकोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में नगर निगम ने कहा था कि उन्होंने शहर में पार्किग बनाने के लिए सात जगहों का चयन किया है। एस्टीमेट तैयार करने का प्रोसेस चल रहा है जबकि कुछ जगहों के लिए पैसा मंजूर हो चुका है। नगर निगम की इस रिपोर्ट को ही आधार बनाकर हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जिन पार्किग स्थलों के लिए पैसा मंजूर हो चुका है तो उनका काम पूरा करके उन्हें तीन माह में अपने अधीन लें।
सूत्रों के अनुसार नगर निगम के पास अभी तक ऐसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है जिसे कि तीन माह में पूरा किया जा सके। आदेश को आए 15 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब बचे ढाई माह में पार्किग कहां बनाई जाएगी यह अभी तय नही है। हाईकोर्ट को सौंपी रिपोर्ट में नगर निगम ने कहीं भी यह नहीं बताया है कि किन पार्किग स्थलों के लिए पैसा मंजूर हो चुका है और पार्किग बनाने के लिए चुने गए सात स्थान कौन से हैं।
शहर में नगर निगम की ओर से पार्किग बनाने की कवायद देखी जाए तो मौजूदा समय में 500 गाड़ियों को पार्क करने की मुहिम पर भी कहीं काम नहीं चल रहा है जबकि कमेटी ने हाईकोर्ट के सामने आंकड़ों में कहा है कि नगर निगम की ओर से चुने गए स्थानों सहित और कहां-कहां कितनी गाड़ियों की पार्किग बननी चाहिए।
ऐसे में हाईकोर्ट के तीन माह में ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने निर्देश का क्या होगा इस पर संशय बना हुआ है। शहर के पार्षदों, पूर्व विधायक और वर्तमान विधायक ने भी नई ट्रैफिक व्यवस्था से जनता को भारी परेशानी की बात कही है। दुखद बात यह है कि इस सारी कवायद में लोगों को फिर भी जल्द राहत नहीं मिल सकेगी।
15 हजार गाड़ियां, 15 सौ के लिए जगह
शहर में ट्रैफिक जाम के पीछे सबसे बड़ा कारण सड़कों किनारे पार्क की गई गाड़ियां हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद शहर में कार्ट रोड, अस्पतालों की ओर जाने वाले रास्तों और स्कूलों के आसपास अनाधिकृत रूप से गाड़ी पार्क करने पर पाबंदी लगा दी। हाईकोर्ट के आदेश और जिला प्रशासन की अधिसूचना के बाद पुलिस ने नई व्यवस्था को लागू भी कर दिया।
शहर में रोजाना अनाधिकृत रूप से गाड़ी पार्क करने के करीब 90 से 100 चालान कट रहे हैं। बार—बार मना करने पर भी अगर गाड़ी नहीं हटाई जाती तो उसे क्रेन से उठाया जा रहा है। शहर में जाम लगने की समस्या से काफी हद तक राहत मिली है, लेकिन लोगों का सवाल अभी भी वही है कि आखिर अब गाड़ी पार्क करें तो कहां।
गाड़ी पार्क करने के लिए लोगों को लिंक रोड की ओर जाना पड़ रहा है जहां पर वे स्थानीय लोगों के लिए परेशानी बन रहे हैं। अभी तक के आंकड़ों को देखा जाए तो शिमला शहर में गाड़ियों को पार्क करने की कुल क्षमता करीब 650 ही है।
शहर में गाड़ियों की संख्या करीब 15 हजार तक है। हर महीने राजधानी में औसतन 250 से 300 गाड़ियों का पंजीकरण होता है। ऐसे में कुल 650 गाड़ियों की पार्किग के बाद लोग गाड़ी कहां पार्क करेंगे। अभी तक के अन्य आंकड़ों को मान लिया जाए तो शहर में येलो लाइन लगाने के बाद भी 600 से 700 गाड़ियों की और पार्क करने की ही व्यवस्था हो सकती है। नई व्यवस्था के बाद भी शहरवासियों को करीब 1500 गाड़ियों से ज्यादा पार्किंग मुहैया नहीं करवाई जा सकती।
नई ट्रैफिक व्यवस्था भी नहीं दे पाई लोगों को राहत
राजधानी में पिछले कुछ दिनों से लागू की गई नई ट्रैफिक व्यवस्था पर जनप्रतिनिधियों ने असंतोष जताया है। शहर में बिना वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढे जिला प्रशासन की ओर से हाइकोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट पर सवाल उठना शुरू हो गए हैं। शिमला के जनप्रतिधियों ने सुझाव कमेटी में जनप्रतिनिधियों को नहीं शामिल किए जाने पर भी ऐतराज जताया है।
शहर में मौजूदा पार्किग व्यवस्था नाकाफी है। इस समय शिमला में करीब आठ हजार गाड़ियां हैं जबकि शहर में निजी और सरकारी पार्किग मिलाकर लगभग दो हजार गाड़ियों की पार्किग है। जिला प्रशासन ने जिन सात पार्किग स्थलों का हवाला कोर्ट में दिया है उन,का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। नगर निगम ने अभी इन पार्किग स्थलों की डीपीआर बनाने के लिए कंस्लटेंट ही नियुक्त किया है। सूत्रों का कहना है कि इन पार्किग स्थलों के निर्माण में अभी कम से कम तीन साल और लगेंगे।
अभी तो केंद्र को प्रस्ताव तक नहीं भेजा
नगर निगम की रिपोर्ट में जिन सात पार्किग स्थलों का हवाला दिया गया है उनमें से कोई भी निर्माणाधीन नहीं है। लिफ्टनाला, आइजीएमसी नाला, संजौली, कैंसर अस्पताल के पास, छोटा शिमला, कैथू और विलो बैंक की पार्किग निर्माण के शुरुआती स्तर पर भी नहीं हैं। निगम प्रशासन ने करीब तीन माह पहले इनकी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के लिए कंसल्टेंट नियुक्त किया है।
डीपीआर बनने के बाद इन्हें केंद्र सरकार को भेजा जाएगा और अगर डीपीआर सही पाई जाती है तो उसे पास किया जाएगा। ये पार्किग पांच साल पहले चिह्न्ति किए गए थे। निगम के अधिकारी इनको बीओटी और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत चलाने की भी संभावना जता रहे हैं। अगर इन पर डीपीआर बनाई जा रही हैं तो इन्हें बीओटी पर देने में दुविधा हो सकती है।










