Friday, Nov 20th, 2009, 2:18 am [IST]  

danik bhaskarएक मासूम की मौत

हर्ष मंदर

harsh_02इशरत जहां की उम्र मुश्किल से 17 साल थी, जब ब्रेन ट्यूमर से उसके पिता का देहांत हो गया। वे अपने पीछे मुंबई के उपनगर मुंब्रा में किराए के एक घर में बड़ा शोक संतप्त परिवार छोड़ गए। इशरत छह बच्चों में सबसे बड़ी नहीं थी, लेकिन सबसे प्रखर और जिम्मेदार थी। वह तब हाई स्कूल मंे ही थी। उसने पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया।

बच्चे जो फीस देते थे, वही परिवार का पेट भरने के लिए आय का मुख्य स्रोत था। इशरत ने बीएससी करने के लिए कॉलेज में एडमिशन लिया। वह परिवार के लिए नाश्ता बनाती, कॉलेज भागती और वापस आकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करती। उसकी मां शमीरा दिन का अधिकांश वक्त सिलाई मशीन पर और साड़ियों में जरी का बॉर्डर लगाते बितातीं। उनके पास टीवी नहीं था।

वे फिल्म देखने या दोस्तों से मिलने नहीं जा सकते थे। वे रोजमर्रा की जिंदगी की उलझनों में ही व्यस्त थे। बाहरी संसार की उन्हें कोई खबर नहीं थी। स्कूल की परीक्षाओं के बाद गर्मियों के महीने परिवार के लिए सबसे मुश्किल होते थे क्योंकि कोई भी पढ़ने के लिए नहीं आता था। मार्च २क्क्४ में कुछ रिश्तेदारों ने परिवार को एक व्यक्ति जावेद से मिलवाया, जो अपने परफ्यूम के व्यवसाय में मार्केटिंग और एकाउंट्स के काम के लिए किसी को ढूंढ रहा था।

सात मुंह को निवाला चाहिए था और मां के पास इसके सिवा कोई और रास्ता नहीं था कि वह इशरत को वह काम करने दें। वह हर महीने ३५क्क् रुपए देता। इस काम में गाहे-बगाहे बाहर जाना भी शामिल था। इशरत थोड़ी-थोड़ी अवधि के लिए पुणो और लखनऊ गई। ११ जून को वह आखिरी बार शहर से बाहर जाने के लिए निकली।

16 जून की शाम को कुछ अजनबी युवा इशरत के घर आए। उन लोगों ने पूछा : आपने समाचार सुना क्या? आने वालों ने पहले तो कहा था कि वे इशरत के कॉलेज से आए हैं और कॉलेज फॉर्म के लिए उसका पासपोर्ट साइज फोटो चाहिए। आखिरकार आठ बजे उन्होंने वह खौफनाक खबर सुनाई। एक पुलिस एनकाउंटर में इशरत की हत्या हो गई है।

उस पर नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का आरोप था। आतंक और सदमे में डूबा परिवार बिल्कुल हक्का-बक्का था। छोटे बच्चों ने तो मोदी का नाम भी नहीं सुना था। उनमें से कोई एनकाउंटर का मतलब भी नहीं जानता था। और वे विश्वास नहीं कर सके कि उनकी प्यारी इशरत अचानक मर चुकी है और उसे आतंकवादी कहा जा रहा है। वह सिर्फ १९ साल की थी।

उनके पास आंसू बहाने का भी वक्त नहीं था। नौ बजे के आसपास पुलिस उनके घर आई, घर सील किया और पूरे दहशतगर्द परिवार को पुलिस स्टेशन ले गई। उसके घर के बाहर पत्रकारों और टीवी कैमरों की भीड़ लगी थी। पुलिस ने ढाई बजे उन्हें वापस घर छोड़ दिया। उनका घर सील था। शमीरा और बच्चे पूरी रात बगल की एक दुकान में जागते रहे।

सुबह तक वहां पत्रकारों का जत्था जमा हो गया। महिला पुलिस की एक टीम आई, सील तोड़ी और बेतरतीबी से आलमारी के सामानों को इधर-उधर फेंककर, गद्दों को फाड़कर और सारा फर्नीचर उलट-पुलट करते हुए घर की तलाशी लेने लगी। तब एक संवेदनशील पड़ोसी इशरत का शव लेने के लिए उसकी मां को अहमदाबाद ले गया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उसे सलाखों से पीटा था।

अंतत: उन्होंने शव उनके सुपुर्द कर दिया। शव खून से लथपथ, गोलियों से छलनी और बिल्कुल अकड़ चुका था। वहां एकत्रित मीडिया अपने कैमरों और सवालों से पागल हुआ जा रहा था। वापस मुंबई लौटने के बाद वे यह देखकर चकित रह गए कि सचमुच दसियों हजार लोगों ने इशरत के अंतिम संस्कार में शिरकत की। सभी चेहरे दुखी और खिंचे हुए थे मानो उन सभी के लिए यह कोई निजी क्षति हो।

कुछ हफ्तों में मीडिया ने भुला दिया, लेकिन पुलिस नहीं भूली। पड़ोसी पहले मददगार थे, लेकिन अगर किसी ने मदद करने की कोशिश की तो पुलिस ने उसे तलब कर लिया और एक आतंकवादी की मदद करने के लिए उन्हें परेशान किया। परिवार अंतत: बिल्कुल अकेला छूट गया। उसकी बहन मुशरत याद करती है, ‘कई बार हमें ऐसा लगा कि आखिर हम क्यों जिंदा हैं?’

वे नए किराए के घर में चले गए। लेकिन पिता और इशरत के बगैर छह लोगों का पेट भरने की जिम्मेदारी ने परिवार को लील लिया। मुशरत ने पढ़ाई छोड़ दी और सिलाई में मां का हाथ बंटाने लगी। छोटा अनवर भी सिलाई करता और उसने कंप्यूटर क्लास लेनी शुरू कर दी थी। लेकिन सब ने उनका साथ नहीं छोड़ा था। कुछ लोग थे, जो गाहे-बगाहे उनके लिए पैसा इकट्ठा करके देते थे ताकि वे जिंदगी बसर कर सकें।

उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में सीबीआई जांच की मांग करते हुए एक याचिका दायर करने में शमीरा की मदद की। लेकिन मामला सुप्त पड़ा रहा। फिर 2006 में उम्मीद की किरणों जगमगा उठीं, जिनकी तनिक भी उम्मीद नहीं थी। दोस्त यह खबर लेकर आए कि गुजरात पुलिस के जिन अधिकारियों ने इशरत को मारा था, उन सबको एक दूसरे झूठे एनकाउंटर में सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी की हत्या करने के आरोप में जेल में डाल दिया गया है।

शमीरा ने गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा कि वह जानना चाहती है कि उसकी बेटी के हत्यारे कौन थे। कोर्ट से कोई जवाब नहीं मिला। मानवाधिकार वकील वृंदा ग्रोवर और मुकुल सिन्हा के साथ शमीरा डटी रहीं। 2007 में जावेद के पिता ने याचिका दाखिल की। दो साल बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी गई।

एक गुमनाम से जूनियर मैट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग ने फॉरैंसिक रिपोर्ट और समस्त बयानों का बारीकी से मुआयना करने के बाद अपने इस निष्कर्ष से सबको चौंका दिया कि इशरत को मारने के बारे में पुलिस का बयान बिल्कुल झूठा और मनगढंत है। पुलिस ने आरोप लगाया था कि इशरत लश्कर-ए-तैयबा की कार्यकर्ता थी, जो तीन अन्य आतंकवादियों के साथ मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से अहमदाबाद आई थी।

पुलिस को भनक लग गई, उन्होंने उसकी गाड़ी का पीछा किया और कार के टायर पर गोली चलाकर उन्हें रुकने के लिए मजबूर कर दिया। फिर आतंकवादी गाड़ी से उतरे और पुलिस पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। अंतत: आत्मरक्षा में पुलिस ने उन चारों को मार गिराया। मजिस्ट्रेट तमांग ने कहा कि इशरत और बाकी तीनों लोग दरअसल तथाकथित एनकाउंटर के कई घंटे पहले ही मारे जा चुके थे।

पुलिस उनके शव बाहर ले गई, खुद ही अपनी जीप पर गोलियां चलाईं, मरे लोगों के हाथ में एके 47 और उनकी कार में बम रखा। यह पुलिस द्वारा ठंडे दिमाग से की गई हत्या थी, जिसमें 19 साल की एक मासूम कॉलेज की छात्रा भी शामिल थी। इस रिपोर्ट ने जाहिर कर दिया कि किन हालात में उनकी प्यारी इशरत की हत्या की गई।

परिवार पिछले पांच सालों से जिस अंधेरे और अकेलेपन में रह रहा था, अब वह उससे बाहर आ सका। उन्हें लगता था कि यह अंधेरा कभी खत्म नहीं होगा। इतने सालों बाद अब फिर से वह अपने घर से माथा ऊंचा करके बाहर निकल सके, फिर से जी सके, उम्मीद की लौ जला सके। यह उम्मीद क्षीण और धुंधली है। फिर भी है तो उम्मीद...

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