तबाही भी ला सकता है टूटा हुआ मीटियोराइट
चंडीगढ़. आसमान में चमकते हुए टूटते तारों को देख हर कोई मुराद मांगता है लेकिन असल में यह कोई टूटता तारा नहीं बल्कि दूसरे ग्रहों और पिंडों से टूटकर गिरने वाले टुकड़े होते हैं। अगर यह टुकड़े कभी बिना चमके और बड़े आकार में जमीन के किसी भी हिस्से से टकरा गए तो भारी तबाही हो सकती है।
खगोलीय घटनाओं में सबसे रोचक और जिज्ञासा का हिस्सा कही जाने वाली इस घटना से जुड़े अनछुए तथ्यों को प्रो. अजीत केम्भवी सामने लाए। इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (आईयूसीएए) के डायरेक्टर प्रो. केम्भवी वीरवार को पीयू में थे। प्रो. केम्भवी फिजिक्स डिपार्टमेंट एस्ट्रॉनमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स वर्कशॉप में शिरकत के लिए आए थे।
प्रो. केम्भवी के मुताबिक आम तौर पर पूरी रात में चार या पांच बार यह घटना देखने को मिलती है। लेकिन कई बार आसमान से झड़ी के रूप में भी चमकते हुए टुकड़े धरती की ओर आते दिखाई देते हैं। लेकिन यह घटना पांच साल में पांच से दस मर्तबा होती है। असल में यह टुकड़े सितारों का हिस्सा न होकर विभिन्न ग्रहों और दूसरे पिंडों से टूटकर बनते हैं।
इसके बाद धरती के गुरुत्वाकार्षण की वजह से यह टूट जाते हैं लेकिन वायुमंडल में हवा के प्रभाव में आते ही यह ठंडे हो जाते हैं। लेकिन कभी ठंडे न हो पाने के बाद जमीन पर पहुंचने की स्थिति में धरती पर क्या प्रभाव होगा? इस सवाल पर प्रो. केम्भवी कहते हैं कि अभी तक ऐसा नहीं हुआ है, लेकिन विज्ञान इस संभावना से इंकार नहीं कर सकता।
इतिहास में ऐसा होने के पुख्ता प्रमाण है। महाराष्ट्र के बुलधाना जिले में पर्यटक स्थल लोनार की झील उल्का-पिंड के जमीन पर टकराने से बनी है। लोनार की पहाड़ी के ऊपर गिरी उल्का का आकार बहुत बड़ा था। इसके आकार और भार की वजह से वहां एक बहुत बड़ा गड्डा बन गया। आज भी इस झील के किसी भी हिस्से पर खड़े होकर देखा जा सकता है कि यह गड्डा किसी भारी चीज के गिरने से बना है। इसके बाद इस गड्डे में पानी जमा होने से यहां झील बन गई। प्रो. केम्भवी कहते हैं कि मीटियोर शावर के बाद एंटारटिका जैसे एरिया में आईस शीट पर कई बार बड़े टुकड़े मिल चुके हैं।










