देश सेवा की भावना भरी है पूरे परिवार में
अम्बाला सिटी. पति की शहादत के बाद उसकी आंखें प्रशासनिक सहायता के लिए बूढ़ी आंखें पथरा गई हैं। इसके बावजूद भी उसने हौसला नहीं छोड़ा। इतना बावजूद होने के बाद उसके मन देश भक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा है। यही वजह रही कि उसने अपने बेटे को फौज में भेज दिया। एक बार उसके फिर हौसले की दाद देनी पड़ेगा।
इस बार वह अपने पौते को भी फौज में भेजना चाह रही है। यह दास्तां है जनेतपुर में रहने वाली कुलवंत कौर की। जिनका पति 19 नवंबर 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान सीमा पर लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। महेंद्र सिंह 18 फील्ड कान्वाय इंजीनियरिंग रेजिमेंट थे। जब चीन के साथ युद्ध हुआ तो उस समय महेंद्र सिंह लापता हो गए थे।
उनकी काफी खोजबीन की गई थी, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला था। आखिर लड़ाई खत्म होने के तीन साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का पत्र कुलवंत कौर को मिला। जिसमें महेंद्र सिंह के शहीद होने पर शोक व्यक्त किया गया था। यह पत्र स्वयं नेहरू ने लिखा था। महेंद्र सिंह के शहीद हुए तो उस समय कुलवंत कौर की पत्नी कुलवंत कौर की उम्र 26 वर्ष थी।
उस समय उनके पास तीन बच्चे थे। उसके बाद तो उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। उनके पास कोई जमीन जायदाद नहीं थी, जिससे वे अपने घर का गुजर बसर कर सकें। उस समय कुलवंत कौर के पास एक भैंस थी जो उसका सहारा बनी। सुबह शाम वह दूध बेचकर अपने तथा अपने परिवार का गुजारा करने लगी। उसके काफी समय कुलवंत कौर की विधवा पेंशन लगी।
आखिर जब बेटा सुखविंद्र सिंह बड़ा हुआ तो उसे फौज में ग्रंथी का पद मिला। अब कुलवंत कौर की इच्छा है कि उनका पौता भी फौज में भर्ती होकर देश की सेवा करे। कुलवंत कौर बताती है कि उनके घर की माली हालत खराब होने के बावजूद भी उसने अपने बेटों की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी।
हिम्मत ने पहुंचाया मुकाम पर
कुलवंत कौर की हिम्मत रही कि 26 साल में विधवा होने के बाद भी उसने किसी प्रकार का हौसला नहीं छोड़ा। उसने पूरी मेहनत की ताकि उनके बच्चे स्टैंड हो सकें। उसने दिन देखा न रात, जब वे उठती उन्हें अपने बच्चों के भविष्य के बारे में चिंता सताती। आज भी कुलवंत वो दिन याद कर बुरी तरह से थरथरा जाती हैं। जब उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हुई थी।
किसी ने नहीं सुनी
हालांकि फौज के अधिकारी कुलवंत कौर के घर आते-जाते रहे। कुलवंत कौर ने उन्हें गैस एजेंसी के लिए कई बार पत्र भी दिए। कई बार पत्र लिखने के बाद भी उन्हें किसी प्रकार का सहारा नहीं मिला। कुलवंत कौर बताता हैं कि स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर उन्हें सम्मानित के लिए बुलाया जाता है, लेकिन इस सम्मान से क्या फायदा जब तक उनका पेट न भरे। उन्होंने का कि एक साल पहले भी उन्होंने लेटर लिखा था, लेकिन उसका भी अभी तक कोई जवाब नहीं आया है।










