चूक गई कैमरे की आंख
राष्ट्रीय मुक्तिबोध नाट्य समारोह में गुरुवार को दो नाटकों का मंचन किया गया। एक निर्माण दल चाहता है कि इनके जीवन पर फिल्म बनाई जाए। एक ऐसा बूढ़ा जो अपने पुत्र और पोतों को खोकर अपनी बूढ़ी स्त्री के साथ पहाड़ी पर झोपड़ी में रह रहा है। उसके जीवन में अपनों की मृत्यु की स्मृति में उगे पेड़ हैं। नदी के किनारे उगे सेमल के पेड़ और उनमें लगे फूल से वह परिचित है।
संजीव मुखर्जी ने बूढ़े पात्र को इतना जीवंत किया मानों एक साथ दो कहानी चल रही हों। शांत और भावना प्रधान नाटक में भाव भंगिमाओं से कहानी के वाक्यों तक ले जाने का प्रयत्न किया गया। कैमरे की आंख भी बूढ़े के आंसू की परतों से ढंक जाती है और वह कहानी के अंतिम चरण को कैद नहीं कर पाता। निर्देशक योग मिश्र ने नाटक से स्पष्ट किया कि आदिवासियों का दर्द अभी भी लोगों के सामने आना बाकी है।
एक रेपिस्ट तो हुआ कम : दूसरा नाटक प्रथम व्यक्ति से एक परिवार के भीतर घटती घटनाओं से समाज की संवेदनहीनता मंचित की गई। नशे की हालत में बासु अपनी ही बहन का दोस्तों के साथ रेप करता है। जब इसकी सच्चई सामने आती है, तो मानव मन की तीसरी परतों में दबी छिपी भावनाएं सतह पर आ जाती हैं और वह अपने बचाव के लिए बड़ी ही आसानी से अभिप्राय बदल देता है।
शकील खान जो परिवार के प्रथम व्यक्ति की भूमिका में है, उसने कठोर सत्य का सामना करते हुए अपने बेटे को पुलिस के हवाले कर दिया। समाज में विडंबना है कि लोगों पर होने वाले प्रहारों को अनदेखा किया जाता है, लेकिन वही स्थिति जब अपने पर आती है, तो सोच बदल जाती है।
नाटक लेखक सैजद फिरदोस और निर्देशक बालकृष्ण अय्यर ने समाज को संदेश दिया है कि हर परिवार में एक प्रथम व्यक्ति होना चाहिए, जिसका फैसला सबके लिए बराबर हो।
आज व्हेन वी डेड अवेकन
शुक्रवार को मणिपुर की टीम की प्रस्तुति होगी। दो दिन चलने वाले इस नाटक का निर्देशन रतन थियाम ने किया है। राजधानी पहुंचे कलाकरों से सिटी भास्कर ने विशेष बातचीत कर उनकी प्रस्तुति के बारे में जाना। 24 सदस्यीय टीम के सभी कलाकार इस मंचन को लेकर काफी उत्साहित दिखे। आरके भोगेन ने बताया कि विश्व में शांति व्यवस्था कायम रखने और इसमें आने वाली बाधाओं को मध्य में रखकर ही व्हेन वी डेड अवेकन का मंचन किया गया है।े










