हर तरफ खामोशी का अंधेरा
विशेष. यह कैसा अंधेरा है? कभी, कहीं, कितनी ही दूर जाकर भी खत्म नहीं होता? बात हमारी उस खामोशी की है जो हर बुराई के प्रति होती है। चुनाव प्रत्याशी जो मन में आए बोलते जा रहे हैं और हम चुप्पी साधे गर्दन हिलाते रहते हैं-कभी हां में, कभी ना में। लेकिन कुछ बोलते नहीं।
कहते हैं-मनुष्य ने चुप्पी का अंधेरा कोख से पाया होता है। सवाल उठता है- कोख के अंधेरे का तो गिना-चुना समय होता है और वह जैसे-तैसे गुजर भी जाता है। क्या इसके बाद समय हमें चुप्पी के अंधेरे की कोख में डालकर भूल गया है? अब तो हमारे टूटे-फूटे सवाल भी अंधेरे की उपज लगते हैं। यह बात अलग है कि सवाल छोटा हो तो वह एक बालक की तरह घुटने-घुटने चलता है और उसे कोई भी प्रत्याशी हवा में उड़ा देता है या उसका कार्यकर्ता उसकी हवा निकाल देता है.. और सवाल एक बालक की ही तरह रोते-रोते चुप हो जाता है या चुप्पी के अंधेरे में खो जाता है।
हो सकता है हमें अपने बड़े होने का अहसास होता हो, लेकिन फिर लगता है-सिर्फ अंधेरा बड़ा हो गया है, अंधेरे के सवाल बड़े हो गए हैं-अंगों की तरह। बाकी चीजें उसी तरह कायम हैं जैसी आजादी के पहले थीं। चाहे कोख के दिनों की तरह कह लीजिए, चाहे 1947 के पहले की तरह कह लीजिए। निकाय चुनावों में अब केवल तीन दिन शेष हैं और पूरा विश्वास है कि 23 नवंबर को राजस्थान जो फैसला देगा वह साबित कर देगा कि यहां तो हर तरफ उजाले का साम्राज्य है।










