इंदौर. इंदौर के चिड़ियाघर में सारे नियमों को दरकिनार कर अजगर की भूख मिटाने के लिए यहीं पाले जा रहे जिंदा खरगोशों को परोसा जा रहा है।
इन्हें बड़ी बेदर्दी से पिंजरे में डाल दिया जाता है और अजगर छपट्टा मारकर इन्हें दबोच लेता है। जबकि 1960 में नियम में बने थे किकिसी जिंदा जानवर को निवाला नहीं बनाया जा सकता। जब यह बात जिम्मेदार अफसर को बताई गई तो पहले वे मुर्गा खिलाने की बात कहने लेकिन बाद में उनके सुर भी बदले और यह भी कहा कि जंगल में तो यह सब खाता है, यहां खा लिया तो उसमें क्या गलत है।
शहर के कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय में वर्तमान में 15 से ज्यादा खरगोश और उनके बच्चों को पिंजरे में बंद करके रखा गया है। जब भी जरूरत होती है तो इन्हीं खरगोशों में से एक को निकालकर अजगरों के आगे डाल दिया जाता है। जानकारी के अनुसार अमूमन 15 दिन में यह सिलसिला दोहराया जाता है। चिड़ियाघर में अभी दो अजगर हैं। इसमें से एक करीब 13 साल पहले और एक अन्य अजगर चार माह पहले जंगल से पकड़कर लाया गया है।
जिंदा नहीं डाल सकतेः भारत सरकार द्वारा बनाए गए पशु क्रूरता अधिनियम 1960 की धारा 11 के अंतर्गत किसी भी जिंदा जानवर को किसी के सामने खाने के लिए परोसा नहीं जा सकता है। चिड़ियाघर में इसी नियम के अंतर्गत शेर आदि जानवरों को मांस दिया जाता है, न कि जिंदा जानवर।
देश के कुछ चिड़ियाघरों में पूर्व में यह प्रथा थी लेकिन अधिनियम का पालन करवाने के बाद इसे बदल दिया गया है। अगर कोई जानवर भूखा रहता है और उसके लिए विशेष खाने की जरूरत है तो उसके लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से इस बारे में विशेष अनुमति लेनी होती है। इंदौर में इस संदर्भ में कोई अनुमति नहीं ली गई है। जब एक अफसर से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बेफिक्री से जवाब दिया कि जंगल में भी तो ऐसा ही होता है।
सोचकर ही सिहरन होती हैः उधर जब इस बारे में पशु प्रेमियों और चिड़ियाघर में आए दर्शकों से बात-चीत की गई तो वे भड़क उठे। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि चिड़ियाघर में ऐसा किया जा रहा है। इनके अनुसार ऐसा करना अमानवीय कृत्य है। इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।
यह तो क्रूरता हैः हमें नहीं मालूम है कि चिड़ियाघर में ऐसा होता है। अगर ऐसा किया जा रहा है, तो यह क्रूरता है। क्या किसी को दिखता नहीं कि बेजुबान खरगोश को कितनी तकलीफ और दहशत होती होगी।
-मधु सक्सेना, वन्यजीव प्रेमी
पूरी तरह अमानवीयः चिड़ियाघर में हो रहा यह कृत्य पूरी तरह अमानवीय है। यह सोचकर ही बड़ा खराब लगता है कि भला कोई कैसे किसी जानवर को मौत के मुंह में सीधे धकेल सकता है। हम इस मामले को आगे तक लेकर जाएंगे। इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।
-सुधीर खेतावत, वन्यजीव प्रेमी
यह तो गलत हैः अगर यह जंगल में होता तो फिर भी ठीक था लेकिन पिंजरों में ऐसा करना वास्तव में क्रूरता ही होगी। खरगोश को कैसी दहशत होती होगी, अजगर उसे कैसे दौड़ा-दौड़ाकर मारता होगा। यह सोचकर ही सिहरन होती है। -नीतेश पाटीदार, दर्शक
दूसरा मांस क्यों नहीं देतेः ऐसा कैसे हो सकता है। हम और बच्चे तो खरगोश को यहां पर देखकर खुश होते हैं लेकिन बाद में उन्हें जानवरों को खिला दिया जाता है। यह तो पूरी तरह क्रूरता है। इसके स्थान पर दूसरा मांस दिया जाना चाहिए जैसा अन्य जानवरों को दिया जाता है। -जीवन सिसौदिया, दर्शक
जंगल में भी तो खाता होगा
इस संबंध में कमला नेहरू चिड़ियाघर के प्रभारी डॉ डीसी गर्ग से की गई सीधी बात-
चिड़ियाघर में जानवरों के क्या हाल हैं?
सब कुछ ठीक-ठाक है।
जो नया अजगर लाया गया है क्या वो खाना खा रहा है?
हां, कल ही उसने खाया है।
क्या खाया उसने? क्या दिया गया था?
मुर्गा खाया है शायद..।
मुर्गा या खरगोश?
हां, हां.. मुर्गा नहीं खरगोश खाया है।
कहां से लाया जाता है यह खरगोश?
हम खुद ही पालते हैं।
अजगर को कितने दिनों में खरगोश देते हैं?
एक बार खा लेता है तो एक-दो महीने की टेंशन खत्म हो जाती है। वैसे कभी आठ दिन तो कभी महीने में देते हैं।
लेकिन जिंदा खरगोश देना तो नियमों के विरुद्ध है?
खरगोश के बारे में मुझे नहीं पता है। वैसे जंगल में यह क्या खाता है और कैसे खाता है। वहां भी तो शिकार करके ही जिंदा खरगोश खाता है न. यहां खा लिया तो क्या गलत किया। उसकी डाइट में शामिल है यह।
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