Friday, Nov 20th, 2009, 6:15 am [IST]  

danik bhaskarसर्द शाम में हर ओर चुनावी गर्माहट

भास्कर न्यूज

बीकानेर. शामें भले ही सर्द हो गईं हों मगर इसमें चुनावी गर्माहट बढ़ती जा रही है। जनसंपर्क प्रचार के बाद थके-हारे प्रत्याशी जब कार्यालयों में बैठकर दिनभर का लेखाजोखा देखते हैं और अगले दिन की रणनीति पर चर्चा करते हैं तब कार्यकर्ताओं की कई टोलियां बगैर प्रत्याशी को साथ लिए ही नाचते-गाते निकल पड़ती है शहर की सड़कों पर।



गुरुवार रात को भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। डीजे पर बजती फिल्मी गीतों पर राजनीतिक पैरोडी और उस धुन पर नाचते-कूदते नारे लगाते एक पार्टी समर्थक युवाओं का जत्था बढ़े जा रहा था। शहर की तंग गलियों, चौक-चौराहों से होती हुई जब एक चुनावी आर्केस्ट्रा रैली निकली तो देखने वाले भी सड़क के दोनों ओर खड़े हो गए।



बड़ा बाजार से आचार्यो के चौक की तरफ होते हुए एक पार्टी के समर्थक नारे लगाते बढ़ रहे थे कि दूसरी पार्टी के समर्थक भी नारे लगाते सामने आ पहुंचे। दोनों ही जत्थे आमने-सामने हो गए और लगने लगे परस्पर विरोधी नारे। एकबारगी लगा नारायुद्ध अप्रिय घटना में न बदल जाए मगर आशंका निराधार निकली।



किसी दल के समर्थक या किसी दल निरपेक्ष व्यक्ति ने उद्घोष लगाया ‘चौफूली का नारा है..’ ऐसे में दोनों तरफ के समर्थकों ने प्रत्युत्तर में हुंकार भरी ‘जीते सो हमारा है।’ नारायुद्ध समाप्त और दोनों दल चल पड़े नारे लगाते हुए अपने-अपने रास्ते। नारे लगाते नाचते-कूदते कार्यकर्ताओं के ये टोलियां शहर में घूमती-घूमती प्रत्याशियों के कार्यालयों तक जा पहुंचती है। ऐसे में थककर कार्यालय लौटे प्रत्याशी एक बार फिर जोश में आ जाते हैं और बाहर आकर देते हैं समर्थकों का साथ।



चुनावी मस्ती में डूबी इन टोलियों से इतर अब चौक-चौराहों पर चुनावी गणित भी जोर-शोर से होने लगी है। कौन किसके वोट काटेगा और किसे किस जाति के वोट मिलेंगे। कैडर का वोट कहां से खिसक रहा है और भितरघात कहां हो सकती है। जैसे तमाम सवाल उठते हैं और जवाब भी पाटों पर ही हाजिर हो जाते हैं। अपने-अपने तरीके से अपने-अपने प्रत्याशी की जीत के दावे होते हैं और नतीजा निकलता है ‘नाई-नाई केस कित्ता- मूंडै सामी आय जासी।’ बात खत्म होती है, चुनाव परिणाम वाले दिन देख लेना।



खुलेआम चलने वाली इन चुनावी चर्चाओं के बीच ही पनडुब्बियों का जिक्र भी गाहे-बगाहे होता रहता है। पनडुब्बियां ऐसे लोगों को कहा जा रहा है जो बगैर किसी शोर-शराबे किसी बड़े परिवार के मुखिया तक पैठ लगाते हैं। बंद कमरे में वार्ताएं करते हैं और रातोंरात वोटर का मन बदलने का माद्दा रखते हैं। हर प्रत्याशी जहां अपनी पनडुब्बियों को पूरी रफ्तार से काम करने के लिए प्रेरित कर रहा है वहीं प्रतिद्वंद्वी की ओर से होने वाली ऐसी ही भीतरी मार पर भी नजरें गड़ाए हैं।



चूंकि कॉपरेरेटर के लिए एक-एक वोट कीमती है, ऐसे में वार्ड के लगभग हर घर को हर दिन किसी न किसी जरिये खंगाला जा रहा है। मकसद यह कि कहीं सेंध तो नहीं लग रही। पाटे पर बैठने वाले इन सारी कवायदों से परिचित हैं और मजा ले रहे हैं चुनावी चौसर पर चल रही हर चाल का।

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