लाठियों के वार से करते थे शेर का शिकार
गुड़गांव. इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि दो साधारण से व्यक्ति जंगल के राजा शेर को लाठियों से पीट-पीटकर मार सकते हैं, लेकिन गुड़गांव पुलिस और वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की टीम ने शेर के अस्थी पिंजरों के साथ भीमा बावरिया नामक जिस व्यक्ति को बल्लभगढ़ से गिरफ्तार किया है, वह और उसका भाई हजारी ऐसा ही करते थे।
छह दिन के रिमांड पर लिए गए भीमा ने डब्ल्यूसीसीबी व गुड़गांव पुलिस अधिकारियों के सामने शेर के शिकार करने का तरीका बताया। भीमा ने पुलिस को बताया है कि उत्तराखंड के कोटद्वार के पास बने जंगलों में वह और उसका भाई हजारी कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर शिकार लाठियों से करते थे। जमीन में लोहे के छल्ले (कुर्का) डालकर उस पर मांस के टूकड़े डालते। शेर मांस खाने के लिए आता तो उसके उसके चारों पंजे इन छल्लों में फंस जाते। इसके बाद भीमा व उसका भाई कुछ अन्य युवकों के साथ मिलकर लाठियों से जंगल के राजा को तब तक पीटते रहते जब तक कि उसके प्राण नहीं निकल जाते।
भीमा ने पुलिस को बताया है कि वे बंदूक का इस्तेमाल इसलिए नहीं करते क्योंकि गोली लगने से शेर की खाल फट जाती और ऐसे में वह बिक नहीं पाती। शेर को लाठियों से भी वे इस तरह मारते कि उसकी खाल को कोई नुकसान न हो। पुलिस सूत्रों के मुताबिक भीमा ने बताया है कि वे निर्ममता से शेर को लाठियों से आधे घंटे तक पीटते थे। भीमा ने पुलिस को बताया है कि कई बार तो दोनों भाइयों ने ही शेर को लाठियों से पीट-पीटकर मारा है।
चीन तक फैला है शेर की खाल का बाजार: उत्तराखंड के कोटद्वार से भीमा बावरिया गिरोह द्वारा मारे गए शेरों की खाल व हड्डियों का बाजार चाइना तक फैला हुआ है। यह काम भारत में कपड़ों के व्यापार में लगे कुछ तिब्बती लोगों द्वारा किया जाता रहा है। डब्ल्यूसीसीबी और पुलिस की संयुक्त जांच में सामने आया है कि पिछले 25 साल से गुड़गांव के सूरत नगर में रहने वाला भीमा बावरिया व उसका भाई शेर की खाल गुड़गांव व दिल्ली लेकर आते थे और यहां कुछ तिब्बतियों को खाल व हड्डियां बेच देते। इसके बाद यह सब नेपाल के रास्ते चाइना तक पहुंचता।
डब्ल्यूसीसीबी के डिप्टी डायरेक्टर रमेश पांडे के मुताबिक भीमा तिब्बतियों से एक शेर की खाल की मोटी रकम वसूलता पांडे के मुताबिक इस तस्करी में शामिल बहुत से नाम भीमा ने बताए हैं, जिन पर जल्द ही शिकंजा कसा जाएगा।










