एक प्रतिमा से दोहरी कृपा
ग्वालियर. पाषाण की अस्पष्ट प्रतिमा को लेकर बहुधा ही भ्रम उत्पन्न होता रहा है। जैसी आकृत नजर आई, उसे वैसे ही देवी-देवता का मान लिया जाता है। फिर होती रहती है पूजा-अर्चना, भले भ्रम का निवारण हो जाए लेकिन आस्था तब तक जड़वत हो चुकी होती है। कम्पू स्थित प्राचीन गणोश मंदिर की यही स्थिति है।
यहां स्थापित प्रतिमा को 60 साल पहले तक लोग हनुमान जी की मान कर पूजते थे, जबकि थी वह गणोश जी की। इसी कारण प्रतिमा को चोला चढ़ाने की परंपरा आज भी कायम है, बस दिन बदल गया है। आज यह मंदिर शहर ही नहीं, समूचे अंचल की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
बताते हैं कि गणोश जी की प्रतिमा सदियों पहले कम्पू में एक पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान थी। यहां सिंधिया रियासत की सेना डेरा डाला करती थी। प्रतिमा किसने और कब स्थापित की, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है।
लोग इस प्रतिमा को हनुमान जी की समझकर पूजा करते रहे। उसरेटे सेन समाज इस प्रतिमा की देखभाल करता था। हर मंगलवार और शनिवार को प्रतिमा पर चोला भी चढ़ाया जाता था। सेन समाज के लोगों ने इस प्रतिमा के प्रति लोगों की बढ़ती श्रद्धा को देखते हुए यहां मंदिर बनाने का निर्णय लिया।
समाज के कुछ वरिष्ठ जन सन् 1948 में सिंधिया सेना के अधिकारी कर्नल शितोले से मिले और उनसे मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। श्री शितोले ने मौके का निरीक्षण किया और प्रतिमा को अच्छी तरह देखा, कुछ विशेषज्ञों से भी दिखवाया।
पता चला कि यह प्रतिमा हनुमान जी की नहीं बल्कि गणोश जी की है। कर्नल शितोले ने मंदिर के लिए जगह देने की अनुमति दे दी। जिस पेड़ के नीचे प्रतिमा विराजमान थी वह बाद में जर्जर होकर गिर गया। सेन समाज ने उसरेटे सेन मंडल का गठन कर मंदिर की स्थापना की।
25 पैसा हर परिवार देता था चंदा: सेन मंडल के पहले अध्यक्ष एनपी नांगिल थे। उन्होंने समाज के सभी वरिष्ठ लोगों से मंदिर का भव्य निर्माण करने की योजना बनाई।
समाज के 140 घरों से मंदिर निर्माण के लिए प्रति माह 25-25 पैसे चंदा एकत्र किया जाने लगा। समाज के युवक आसपास के जंगलों से पत्थर कंधों पर उठा-उठाकर लाते थे। मंदिर परिसर में कुआं खोदकर निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
पहले मंदिर का भवन कच्च था। बाद में इमारत पक्की की गई। और अब यह भव्य मंदिर है। श्री नांगिल के बाद प्रेम नारायण कश्यप, गेंदालाल सविता, जगदीश सविता ने मंदिर निर्माण कार्य को समय-समय पर आगे बढ़ाया। वर्तमान में मंडल अध्यक्ष विजय सेन हैं। मंदिर में भजन संध्या के लिए एक हॉल और बनाने के लिए मंडल प्रयासरत है।
इस कार्य में समाज के संतोष सविता, रमेश सेन, शंकर सविता, भगवानलाल सविता, कैलाश सविता, गोपाल सेन और अन्य वरिष्ठजन समर्पित हैं। मंदिर के पहले पुजारी पं. कामता प्रसाद शर्मा थे। वर्तमान में पं. रामप्रकाश शर्मा यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
शादी न हो रही हो तो जरूर आएं :जिस युवक या युवती का विवाह नहीं हो पा रहा हो, यदि वह पांच बुधवार यहां पूजा कर चोला चढ़ाने के साथ-साथ लड्डू, दूबा और पालक का भोग लगाए तो गणपति उसकी मनोकामना पूरी करते हैं।










