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Friday, Nov 20th, 2009, 8:51 am [IST]  

danik bhaskarअच्छा होता कि हम बंदर ही रहते

भास्कर न्यूज

कुरुक्षेत्र. केयू में नार्थ जोनल इंटर यूनिवर्सिटी युवा समारोह के चौथे दिन युवा कलाकारों ने मूक अभिनय के जरिए बहुत कुछ बयां कर दिया। ऑडिटोरियम में आयोजित मूक अभिनय प्रतियोगिता में भाग लेने वाले 20 विश्वविद्यालयों में से अधिकतर ने विश्व समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया। श्वेत-श्याम रंगों में दिखते कलाकारों ने रंगीन दुनिया को बढ़े ही भाव पूर्ण रूप में अभिनीत किया।



अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने आदि से आज तक का विश्लेषण केवल पांच मिनट में करते हुए यह जताने का प्रयास किया कि हम बंदर से मानव तो बन गए लेकिन अच्छा होता कि हम बंदर ही रहते। पहले आदी मानव बंदर था, जब आदमी बना तो आरंभ हुई समस्याएं भी। अंत में यही इच्छा होती है कि काश हम बंदर ही होते..।



किसानों की दयनीय दशा सदा से साहित्य व इतिहास का हिस्सा बनती आई है। मुंशी प्रेमचंद से लेकर आधुनिक लेखकों ने इस पर खूब लिखा लेकिन कोई नहीं जागा। आज भी किसान कर्ज के बोझ में आत्महत्याएं कर रहे हैं। यह व्यथा मूक अभिनय का भी हिस्सा रही। एमडीयू रोहतक के विद्यार्थियों ने अपनी मिमिक्री में इसका मात्र पांच मिनट में सराहनीय वर्णन किया।



किसान खेती में घाटे, बेटी की शादी में कर्ज व बेटे को धन कमाने के लिए विदेश भेजने के चक्कर में कर्ज के बोझ में दब जाता है और परिणति होती है दुखद अंत..कुएं में कूद कर आत्म हत्या। पंजाब टेकिAकल विश्वविद्यालय जालंधर ने नारी के अदम्य साहस को दर्शाया। जो नारी पति के उत्पीड़न से दुखी है। शराबी पति घर का सारा काम करने वाली पच्ी को जला देता है।



उसका सामना फिर होता है दूसरी पत्नी से जो जानती है मार्शल आर्ट, और वही उसे करती है सीधा. । इस प्रकार अबला के आधुनिक सबला रूप का वर्णन मूक अभिनय में भी कहानी कहता नजर आया। पंजाब विश्वविद्यायलय चंडीगढ़ ने फैल रहे प्रदूषण व उसे रोकने में किसानों द्वारा निभाई जाने वाली सरहानीय भूमिका को दिखा कर किसान को दुनिया का सबसे बड़ा हितैषी जताया।



उधर मोबाइल के बढ़ते कुप्रभाव को भी मूक अभिनय ने नहीं बख्शा। भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर कलां के कलाकारों ने मोबाइल को कुछ यूं जिंदगी के लिए भारी माना कि मरने के बाद भी मोबाइल का मोह नहीं जाता। युवक की शादी में मोबाइल बजता है तो वह फेरे छोड़कर मोबाइल सुनने लगता है।



जिंदगी भर मोबाइल की भाग दौड़ उसके जीवन का अंग रहती है, अंत में फोन सुनते हुए सड़क पार करते हुए वह दुर्घटना का शिकार हो जाता है और मौत के बाद भी मोबाइल का खिलवाड़ जारी रहता है। जब चार लोग अर्थी उठा कर जाते हैं तो मोबाइल के गुलाम वो भी अर्थी छोड़ फोन उठा लेते हैं। पत्नी भी रोना छोड़ फोन सुनती है।



इसी दौरान उस मृत पति का भी मोबाइल बजता है और उसकी आत्मा फिर मोबाइल का मोह दिखाते हुए अर्थी से उठकर मोबाइल सुनने लगती है। केयू के कलाकारों ने अपने अभिनय में प्रदूषण के प्रति आवाज बुलंद करने का प्रयास किया। चौ. देवी लाल विश्वविद्यालय सिरसा के कलाकारों ने धार्मिक भेद-भाव को अपनी प्रस्तुति से उभारा।



सीएसजेएम विश्वविद्यालय कानपुर ने सुनामी के कारण पैदा हुई भुखमरी की समस्या को उजागर किया। इनके अतिरिक्त दून विश्वविद्यालय देहरादून, माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय कटड़ा, गुरु अंगद देव एंड ऐनिमल सांईस विश्वविद्यायलय लुधियाना, जम्मू विश्वविद्यालय जम्मू, चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय दिल्ली, सीएसके हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर, लवली प्रौफेशनल विश्वविद्यालय फगवाड़ा, जीबी पंत विश्वविद्यायल पंत नगर आदि ने भी रोचक प्रस्तुतियां दी।



मिट्टी से उपजी ममता की आवाज...



मिट्टी मां होती है और मां के रूप अनेक हो सकते हैं, लेकिन ममता हर रूप में एक ही होती है। जी हां, मां की इसी ममता को मिट्टी के सांचे में ढालने का सफल प्रयास किया पूरे उत्तर भारत से आए युवा शिल्पियों ने केयू के ललित कला विभाग में। नार्थ जोनल इंटर यूनिवर्सिटी युवा समारोह के चौथे दिन आयोजित क्ले माडलिंग प्रतियोगिता में 20 विश्वविद्यालयों के युवा कलाकारों ने दिए गए विषय ममता को बढ़े ही गूढ ढंग से तराशने का प्रयास किया।



मां का रूप केवल नारी ही नहीं अपितु पशु व पक्षियों में भी दिखाया गया। किस प्रकार एक मां वात्सल्य पूर्ण होती है और उसके लिये अपने जीवन से भी बढ़कर अगर कोई चीज होती है तो वह है उसकी संतान। बेजान मिट्टी में अपने औजारों से युवा कलाकारों ने ममता के रंग भरकर उसे मुंह बुलवा दिया।

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