निर्णयों को पी गई संस्थाएं
उज्जैन. गृह निर्माण संस्थाओं के लिए विभागीय आदेश और न्यायालय के फैसले कोई मायने नहीं रखते। अवंतिका कर्मचारी गृह निर्माण संस्था से भूखंड लेने वाली अरुणा रमेशचंद्र मेहता के मामले से यह साबित होता है।
स्व. रमेशचंद्र मेहता ने संस्था से 1975 में भूखंड खरीदा था। मकान का निर्माण संस्था को करना था। मेहता ने सहकारी आवास संघ से 22000 रु. का ऋण लेकर भूखंड बंधक रखा। समिति ने 1983 में मकान का कुछ हिस्सा बनाकर काम रोक दिया। लंबे इंतजार के बाद भी मकान नहीं मिला तो मेहता ने न्यायालय की शरण ली।
89 में उपपंजीयक न्यायालय ने समिति को दोषी पाते हुए 50 हजार रु. हर्जाना तथा ऋण राशि में से 15931 रु. काटकर शेष राशि तथा ब्याज मेहता को देने के आदेश दिए। इस आदेश पर अब तक अमल नहीं हुआ है जबकि न्यायालय राजस्व मंडल ग्वालियर ने भी इस पर मोहर लगाई है।
वसूली के लिए 500 से ज्यादा तारीखें लग चुकी हैं। मेहता द्वारा 10 न्यायालयों में दायर वाद में से 8 में मेहता के पक्ष में फैसले हुए। मेहता की मृत्यु के बाद पत्नी अरुणा ने आवास संघ द्वारा भूखंड की नीलामी से बचने के लिए 3.60 लाख रु. एकमुश्त जमा कराए गए। संस्था ने भूखंड आवंटन निरस्त करने हेतु न्यायालय में वाद दायर किया जिसे न्यायालय ने प्रारंभिक तौर पर खारिज कर दिया है।
वसूली की कार्रवाई से संबंधित प्रकरण संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं के न्यायालय में विचाराधीन हैं। अरुणा मेहता के अनुसार वे मुख्यमंत्री, सहकारिता मंत्री, कलेक्टर, सहकारिता आयुक्त सहित सभी संबंधित को शिकायत कर चुकी है लेकिन अब तक न भूखंड मिला न मकान।










