शहर किसी की जागीर नहीं
वर्तमान समय में उपद्रव की मानसिकता कई बार छोटे-मोटे विध्वंसात्मक रूपों में भी व्यक्त होती है तो गुस्से और चिढ़ के रूप में भी। अकसर ही उस गुस्से से सामना हो जाता है, जैसेकि ट्रैफिक जाम या ऐसा ही कुछ और भी। लेकिन इस तरह की सभी घटनाएं बहुत चिंताजनक हैं। अगर महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एमएनएस और कर्नाटक समेत अन्य जगहों पर ऐसे ही दूसरे समूहों को संस्कृति के बीच विभाजन रेखा खींचने की इजाजत दे दी जाए तो एक लंबी अवधि में ये समूह एक सभ्य सुसंस्कृत समाज के लिए वास्तव में खतरा होंगे।
अब उसी मामले को ले लीजिए, जिसमें एमएनएस ने एक फिल्म निर्देशक पर यह दबाव डाला कि वह अपनी फिल्म में बॉम्बे शब्द का इस्तेमाल करने के लिए माफी मांगे। यह दीगर बात है कि एमएनएस ने किस संकीर्ण तरीके से चुनावों के मद्देनजर यह कदम उठाया था (दरअसल पार्टी के लिए तो यह कतई संकीर्णता का मामला नहीं था)। यह भी बाद की बात है कि संबंधित निर्देशक ने माफी मांग ली। एमएनएस की तरह मुख्यधारा से इतर ऐसे छोटे-मोटे समूहों ने एक आदत सी बना ली है कि वे इस तरह की उपद्रवी मांगें करते रहते हैं।
अगर इसके पीछे कोई सीधा कारण न भी हो तो भी एक किस्म के भावनात्मक दोहन का इरादा तो होता ही है। इस तरह के समूहों के लिए हिंसा बड़ी आसान सी चीज होती है। हिंसा, जिसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर संतुलित तरीके से किया जाता है कि जिससे भौतिक रूप से कम से कम नुकसान हो, लेकिन जिसका मनोवैज्ञानिक असर अतिशय रूप से बहुत भयानक होता है। इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन इन समूहों ने मुंबई परीक्षा देने के लिए आए हुए विद्यार्थियों पर हमला किया और बंगलुरू में ‘स्थानीय बनाम बाहरी लोग’ के मुद्दे पर फसाद खड़ा किया।
ऐसी घटनाओं के तुरंत बाद राज्य मामला तो दर्ज कर लेता है, लेकिन कानून का डर दिखाने के लिए शायद ही कभी आगे कोई और कदम उठाता है। इसलिए समय के साथ इस तरह के छोटे-मोटे समूह दोगुनी-तिगुनी रफ्तार से बढ़ते जाते हैं। वैसे भी स्थानीय लोगों के सवालों और समस्याओं के लिए लड़ना फायदे का काम होता है। अधिकांश मामलों में ऐसे समूह चुनावी मुनाफे के गणित से बाहर होते हैं। स्थानीय बनाम प्रवासी का मुद्दा प्राय: ऐसी जगहों पर ज्यादा असर डालता है, जहां पर मिली-जुली जनसंख्या रहती है।
मुंबई को १९७क् से ऐसी समस्याओं से जूझना पड़ा है और बंगलुरू पिछले एक दशक से इनका सामना कर रहा है। यद्यपि दक्षिण में ऐसे मुद्दों के पीछे एक छिपा हुआ सवाल भाषा का भी रहा है। स्थानीय लोगों को मौके नहीं दिए जाते। यही कारण है कि ऐसे समूह दूसरे नागरिकों के प्रति अपने बहुत खराब रवैए के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल होते हैं। एक ओर तो ऐसे उपद्रवी समूहों को पूरी तरह से खारिज या दरकिनार कर देना असंभव है, लेकिन वहीं दूसरी ओर स्थानीय बनाम प्रवासी के इस मुद्दे को दो तरीकों से हल किया जा सकता है।
एक तरीका तो यह हो सकता है कि बहुत कठोरता से संविधान का अनुपालन किया जाए। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को यह बुनियादी अधिकार देता है कि वह अपनी मर्जी से काम कर सकता है और रह सकता है। एमएनएस जैसे समूहों से दृढ़ता से निपटने के लिए राज्य सत्ता नागरिकों की ओर से इस अधिकार को लेकर संघर्ष कर सकती है। राज्य सत्ता ऐसा नहीं करती है क्योंकि ऐसे संगठनों के छिपे हुए राजनीतिक सुर के कारण बाकी सभी संगठनों को रक्षात्मक रवैया अपनाना पड़ता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इसके पीछे वोट पाने और वोटों को खो देने का खतरा भी मौजूद होता है।
महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना के साथ गठबंधन करेगी और शिवसेना की समस्त नीतियों को भी स्वीकार करेगी, जिसमें बाकायदा एक व्यवस्था के तहत गैर स्थानीय लोगों को मुंबई आने और वहां पर काम करने से रोकना भी शामिल है। लेकिन वही भाजपा कर्नाटक में उन कन्नड़ भाषियों को आर्थिक अवसर न दिए जाने के खिलाफ चीखेगी और आवाज उठाएगी, जो मुंबई में जाकर बस गए हैं। ठीक उसी तरह कन्नड़ रक्षणा वेदिके बिहारियों को बंगलुरू में प्रवेश परीक्षा देने से रोकेगी, लेकिन गोआ में प्रवासी कामगारों के सवालों के लिए आवाज उठाएगी।
संविधान इस बात की गारंटी देता है, इसलिए बुनियादी अधिकारों के तहत कानूनन लोग काम करते हैं, लेकिन उन लोगों को कोई भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिलती, जो आर्थिक अवसरों और ज्यादा बेहतर जीवन-शैली के कारण दूसरे शहरों में जाकर रहते हैं। इस समस्या से निपटने का एक दूसरा तरीका भी हो सकता है। इस सुझाव पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि ऐसे शहर जो आर्थिक केंद्र हैं, उन्हें राज्य सरकार से स्वतंत्र घोषित कर दिया जाए। उन शहरों को राज्य के राजस्व से और भौगोलिक रूप से भी मुक्त कर दिया जाए।
उदाहरण के लिए यदि मुंबई और बंगलुरू को मेट्रो राज्य का दर्जा दे दिया जाए तो स्थानीय बनाम प्रवासी का सवाल तो अपने आप ही खत्म हो जाएगा। न तो मराठी मुंबई को अपनी संपत्ति समझ सकेंगे और उस पर अपना दावा कर सकेंगे और न ही कन्नड़ लोग बंगलुरू पर अपना एकाधिकार समझ सकेंगे और इसका अर्थ होगा, सभी के लिए वरीयता का एकसमान प्लेटफॉर्म तैयार करना, जिसमें सभी भागीदार हो सकेंगे। सबके लिए समान अवसर होंगे और सभी को एक जैसे नियमों और शर्तो पर प्रतिस्पर्धा में उतरना होगा।
लेकिन यह करना आसान नहीं है क्योंकि अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्र इन शहरों के साथ राज्य सरकारों के भी ढेर सारे हित जुड़े हुए हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक, दोनों को मुंबई और बंगलुरू के उन राज्यों का हिस्सा होने के कारण कर राजस्व के मामले में जबर्दस्त फायदा होता है। ये राज्य निश्चित तौर पर इन दोनों शहरों को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिए जाने का विरोध करेंगे। लेकिन इन सबके बीच से कोई रास्ता निकलना चाहिए। संभवत: ये शहर राज्यों की राजधानी के रूप में कार्य कर सकते हैं और यदि जरूरी हो तो राजस्व साझा करने का भी कोई मॉडल बनाया जा सकता है।
अगर ये ‘शहर-राज्य’ या फिर इसे जो भी नाम दिया जाए, बन जाते हैं तो इससे नागरिक ढांचे के शासन और प्रबंधन के स्तर पर भी मेट्रो शहरों को बहुत लाभ प्राप्त होगा। हांगकांग और सिंगापुर शायद चरम उदाहरण हैं और संभवत: वहां का राजनीतिक संदर्भ बिल्कुल भिन्न है। फिर भी उनका अनुसरण करना अच्छा है क्योंकि वे प्रवासियों और उनके सपनों के बल पर ही इतने बड़े आर्थिक इंजन बन सके। अपना भावनात्मक मालिकाना हक जताने वाले पुरातनपंथी विचार इन शहरों को अपना गुलाम नहीं बना सके।










