Saturday, Nov 21st, 2009, 12:48 am [IST]  

danik bhaskarइंस्पेक्टर मातादीन की ताजा धरती यात्रा

रविशंकर श्रीवास्त

जनता जब ज्यादा ही चिल्लाने लगी कि मेरा धर्म तेरे धर्म से ज्यादा सफेद तो बात चांद पर भी पहुंच गई। आखिर इंस्पेक्टर मातादीन से रहा नहीं गया। अब तो जनता से उसका सही धर्म उगलवाना ही पड़ेगा। वे अभी निकले ही थे कि सामने ट्रैफिक जाम मिला। पता चला कि किसी वीवीआईपी नेता के काफिले के लिए ट्रैफिक रोका गया है। अब वे तो सुपर कॉप इंस्पेक्टर मातादीन थे। उन्होंने अपना डंडा अड़ाया और वीवीआईपी नेता को रोका। उनसे बोला- महामहिम, मेरे कन्ने ये झूठ पकड़ने की मशीन भी है और ये नाकरे टेस्ट वाला इंजेक्शन।



इधर धर्म के नाम पर दुनिया में बड़ा बावेला मच रहा है, दंगे-फसाद हो रहे हैं। मेहरबानी होगी, अब आप सच-सच बता दें कि आपका धर्म क्या है? वीवीआईपी नेता पसीने-पसीने हो गया। उसकी जुबान से अब तक, जब से वो नेता बना था, कभी सच तो निकला ही नहीं था। वो बोला- ‘भई, मेरा धर्म तो नेतागिरी है। ऐन-केन-प्रकारेण वोट कबाड़ने का धर्म। वोटर मेरा भगवान और इलेक्शन मेरा त्योहार।’ इंस्पेक्टर मातादीन कन्फ्यूजिया गए। ये कौन सा नया धर्म आ गया, पर मशीन इसे सच बता रही थी। वो हिचकिचाते हुए आगे बढ़े।



सामने पीली बत्ती वाली कार में सिविल सेवा का एक आला अफसर चौराहे की लालबत्ती की परवाह किए बगैर चला आ रहा था। मातादीन ने डंडा चमकाया तो अफसर भुनभुनाता हुआ आया। मन में भाव थे- बाद में देख लूंगा तुझे। ऐसी जगह फिकवाऊंगा कि बस तनख्वाह में गुजारा करता फिरेगा। इंस्पेक्टर मातादीन ने आदतन सल्यूट दागा और फिर बोला- श्रीमान मेरे पास झूठ पकड़ने की मशीन है और सच उगलवाने का इंजेक्शन। मैं जनता का असली धर्म पता करने निकला हूं। आप भी जनता का हिस्सा हैं।



तो जरा बताने का कष्ट करेंगे कि आपका धर्म क्या है? अफसर चकराया। मगर झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का इंजेक्शन देख चालू हो गया- ‘भई, मेरा धर्म तो पैसा कमाना है। भ्रष्टाचार के जरिए रेत में से तेल निकालना। हम सिविल सेवा में आए ही इसलिए हैं। हमें तो ट्रेनिंग के दौरान ही सिखा दिया गया था। सरकारी योजनाओं से, जनता की जेब से पैसा निकालना और उसे सुरक्षित इन्वेस्ट करना ही हमारा धर्म है।’ इंस्पेक्टर मातादीन का दिमाग भन्नाया। ये और कौन सा नया धर्म आ गया है। कभी इसके बारे में नहीं सुना।



वे वापस मुड़े तो एक बुद्धिजीवी से टकरा गए। बुद्धिजीवी ने उन्हें पहचान लिया और पूछा कि वे चांद से कब लौटे। मातादीन ने उसे हड़काया और उसका धर्म पूछा। बुद्धिजीवी ने इंस्पेक्टर मातादीन को बताया कि वो तो बे-धर्मी है। अगर इंसानियत नाम का कोई धर्म होता तो जरूर वो उसका धर्म हो सकता था। मगर आजकल इंसानियत तो रही नहीं। इंस्पेक्टर का दिमाग चकराया। वे उससे पिंड छुड़ाकर भागे और झुग्गी बस्ती में पहुंच गए। जनता का असली धर्म यहीं पता चलेगा। वहां सबसे पहले सामने पड़ने वाले आदमी को बुलाया।



वो पच्चीस साल का जवान था पर पचहत्तर का बूढ़ा लग रहा था। बता बे, तेरा धर्म क्या है? वो आदमी अपनी कांपती आवाज में बोला- ‘माई-बाप! हमें क्या पता हमारा धर्म क्या है। आप ही बता दें। हमें तो अपनी रोजी-रोटी कमाने से ही फुर्सत नहीं मिलती।’ बस, चुप कर! इंस्पेक्टर मातादीन का दिमाग पूरी तरह भन्ना गया। जनता झूठी है। झूठ-मूठ का धर्म निभाती है और बेवजह धर्म के नाम पर फसाद करती है। आज सच पकड़ में आ ही गया। वे मन ही मन भुनभुनाए और वापस चांद पर जा पहुंचे।

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