चौंतीस साल बाद ऐतिहासिक निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर मोहर लगाते हुए बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान हत्याकांड में 12 आरोपियों की मौत की सजा बरकरार रखी है। इस फैसले के बाद सेना के उन पूर्व अधिकारियों को फांसी के तख्ते पर चढ़ना होगा, जो राष्ट्रपिता और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या की साजिश में शामिल थे। 15 अगस्त 1975 को बंगबंधु की हत्या हुई थी।
26 सितंबर 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति खांडोकर मुश्ताक अहमद ने एक अध्यादेश जारी करके हत्याकांड के मामले की सुनवाई पर रोक लगा दी थी। 21 साल के बाद जब अवामी लीग सत्ता में आई तो 12 नवंबर 1996 को उस अध्यादेश को निरस्त करके सुनवाई का रास्ता प्रशस्त किया गया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बांग्लादेश के इतिहास में काफी महत्वपूर्ण है।
अहम बात यह है कि बंगबंधु हत्याकांड की सुनवाई सामान्य कानूनों के तहत नियमित अदालतों में हुई, न कि विशेष अदालतों में। ऐसे में सुनवाई में पारदर्शिता और पक्षपात संबंधी संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। सुनवाई और अंतिम फैसले से न्यायपालिका की स्वतंत्रता साबित हो जाती है।
बंगबंधु की हत्या देश के लिए एक कलंक रही है और यह फैसला उस कलंक को मिटाने में मददगार साबित होगा। हम अपने राष्ट्रपिता की जान बचाने में विफल रहे, लेकिन फैसला बताता है कि उनके हत्यारे भी अंतत: कानून के फंदे से नहीं बच पाए। इस फैसले से देश में न्याय का शासन और मजबूत ही होगा।
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