मोबाइल चार्ज करो, बॉडी भी
आप कहीं लंबे टूर पर गए हैं और मोबाइल का चार्जर साथ लेना भूल गए हैं। बैटरी कम होने के साथ साथ आपका दिल भी घटता जाता है। लेकिन अब फिक्र करना छोड़ दीजिए, सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल घग्गा के ग्यारहवीं कक्षा (आट्र्स)के दो साधारण बच्चों ने ऐसी अनोखी रिसर्च की है जिसे देख साइंस वाले भी हैरान हैं। इन छात्रों ने अपनी खोज से जूतों से मोबाइल चार्ज करने का कारनामा करके दिखाया है। स्कूल मुखी और गाइड अध्यापक मनजिंदर सिंह के मुताबिक सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह विषय खुद बच्चों ने चुना और खुद आगे आकर इस पर खोज करने की इजाजत मांगी। इसके बाद साइंस के अध्यापकों के सहयोग से उन्होंने यह रिसर्च पूरी की। अगर उनकी इस रिसर्च को अप्रूवल मिल जाती है तो टूर पर मोबाइल लेकर जाने के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा।
ऐसे होंगे मोबाइल चार्ज: दोनों छात्रों सतनाम सिंह और भगवंत सिंह ने बताया कि उन्होंने आम साइकिलों पर लगने वाली डैनबो (छोटी) की गरारी पर एक दांतों वाली (दंदेदार) चक्करी लगाई जो डैनबो की गरारी को घुमाती है। इस मिलन से माइनर करंट पैदा होता है जो मोबाइल की बैटरी को चार्ज करने में सहायता करता है। यह सिस्टम बेहद छोटा होता है जिसे जूते के नीचे लगाया जा सकता है। जूते का भार जब धरती पर पड़ता है तो यह गरारी भी घूमती है और इससे पैदा होने वाली पावर से मोबाइल बेहद आसानी से चार्ज हो जाता है। गाइड अध्यापक मनजिंदर सिंह के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति इस सिस्टम को जूते के नीचे नहीं लगाना चाहे तो वो जेब में भी रख सकता है और जेब में रखकर भी वो आसानी से चलते फिरते मोहाइल चार्ज कर सकता है।
क्या होती है डैनबो: पुराने समय में साइकिलों के पिछले पहिए के बराबर में एक छोटा सा डिब्बीनुमा बॉक्स लगाया जाता था। यह बाक्स साइकिल के पहिए के साथ रगड़ खाकर करंट पैदा करता था। इस करंट से साइकिल के हैंडल में लगी लाइट जलती थी। मतलब जितनी तेज साइकिल चलती थी उतनी ही तेज करंट पैदा होता था और लाइट की रोशनी भी बढ़ती जाती थी। डैनबो से लेकर हैंडल में लगी लाइट तक बिजली की तार लगी होती थी। इसके माध्यम से ही करंट वहां तक पहुंचता था।
साइंस मेले में किया प्रदर्शन: घर के फालतू आम सामान से इस तरह के प्रोजेक्ट को लेकर न्यू पावर हाउस कन्या सीनियर सेकेंडरी स्कूल में आयोजित साइंस फेयर में पहुंचे इन दोनों छात्रों की बेहद प्रशंसा हुई। जिला साइंस सुपरवाइजर प्रभसिमरन कौर ने ऐसे अध्यापकों और छात्रों की प्रंशसा करते हुए कहा कि अगर ऐसी ही दिलचस्पी सभी स्कूलों के अध्यापक और छात्र लें तो साइंस में कम हो रही छात्रों की रूचि को बढ़ाया जा सकता है।










