पावर गैलरी
स्वाइन फ्लू में भारतीय डॉक्टरों की पौ-बारहः जब से देश में स्वाइन फ्लू का कहर टूटा है, दवाओं की क्लिनिकल ट्रायल के नाम पर कई भारतीय डॉक्टर चांदी काट रहे हैं। बाहर की विदेशी दवा कंपनियां अपनी काफी सारी दवाओं की सरकारी और निजी अस्पतालों के डॉक्टरों से क्लिनिकल ट्रायल करवा रही हैं। चर्चा है कि इसके लिए वे प्रति मरीज 600 डॉलर (लगभग 28 हजार रुपए) का भुगतान कर रही हैं।
पहले पिता फिर पुत्र
वाई एस डडवाल जब संयुक्त पुलिस आयुक्त दक्षिण दिल्ली थे, तब इसी इलाके के एक रेस्तरां में जेसिका लाल हत्याकांड घटित हुआ था और उसकी वजह से वह खासे चर्चा में रहे थे। अब जब वह दिल्ली पुलिस के आयुक्त हैं, इस हत्या के दोषी मनु शर्मा को पैरोल के दौरान दक्षिण दिल्ली के जिस रेस्तरां में देखा गया, उस वक्त वहां उनका बेटा मौजूद बताया जाता है जिसकी इन दिनों काफी चर्चा है।
तीन दिन दिल्ली, तीन दिन कोलकाता
गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने ममता बनर्जी से कहा, तुम कहां से आ गईं? यह सुनकर ममता बनर्जी नाराज हुईं और उन्होंने कहा कि मैं मंत्री हूं और कैबिनेट की सदस्य हूं। जवाब में लगभग सफाई देते हुए शिंदे ने कहा कि आज तो रेलवे का कोई एजेंडा भी नहीं है और आप अक्सर कोलकाता में रहती हैं। पलटकर ममता ने जवाब दिया कि नहीं, मैं तीन दिन दिल्ली में रहती हूं और तीन दिन कोलकाता में। इस पर बैठक में मौजूद सभी सदस्यों की हंसी फूट पड़ी। उनमें से एक ने कहा कि नीतीश कुमार भी यही करते थे, वह तीन दिन दिल्ली और तीन दिन पटना में रहते थे, आज वह सीएम बन गए हैं और अब आपकी बारी है। इस दिलचस्प संवाद का मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों ने खूब मजा लिया।
कमलनाथ ने बाजी मारी
केंद्रीय भूतल मंत्री कमलनाथ ने हाल ही में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया को मात देते हुए निविदा के नियमों को बेहद सरल बनवाने में भारी सफलता हासिल कर ली। योजना आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव बी के चतुर्वेदी ने निविदा नियमों को सरल बनाने पर मोहर लगाते हुए कमलनाथ के पक्ष में रिपोर्ट दी है। आहलूवालिया इसका नाकाम विरोध करते रह गए।
बातें कम विनिवेश ज्यादा
केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने नॉर्थ ब्लॉक में एक फरमान जारी किया कि बातें कम की जाएं और विनिवेश (डिसइनवेस्टमेंट) ज्यादा किया जाए। इसी को आत्मसात करते हुए उन्होंने उदाहरण भी पेश किया, जब सार्वजनिक निगमों में भारी-भरकम विनिवेश के बेहद अहम फैसले को उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी दिलवाई। यही नहीं, इसकी घोषणा भी प्रेस कांफ्रेस में खुद न करते हुए उन्होंने विनिवेश सचिव से करवाई ताकि खुद परदे के पीछे रहकर एक बड़ा कर काम कर सकें।
वोलकर कांड की पुनरावृत्ति?
मधु कोड़ा के यहां पड़े छापों को जहां सत्ता के गलियारों में ‘अकाउटिंग प्रॉब्लम’ बताया जा रहा है, वहीं चर्चा यह भी है कि कहीं यह कांग्रेस के लिए नटवर सिंह के वोलकर कांड की पुनरावृत्ति तो नहीं। क्योंकि कांग्रेस हाईकमान इस मामले को लेकर उसी तरह गंभीर दिखाई दे रहा है, जैसा वह वोलकर कांड को लेकर था। अंदरूनी सूत्रों पर यकीन करें तो पार्टी के भीतर इस पूरे मामले की एक आंतरिक जांच रिपोर्ट भी तैयार करवाई जा रही है।
फुरसत के अपने-अपने अंदाज
भारतीय जनता पार्टी में आजकल इतनी कम गतिविधियां हैं कि उसके कई नेता नए-नए तरीकों से अपने को व्यस्त रख रहे हैं। राजीव प्रताप रूड़ी एडवांस पायलेट कोर्स करने के लिए अमेरिका चले गए हैं। रविशंकर प्रसाद वकालत में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं। अरुण जेटली राज्यसभा में विपक्ष के नेता होने के कारण वकालत नहीं कर सकते, इसलिए वह शाम को डीवीडी देखकर अपना समय गुजार रहे हैं। प्रतिभा आडवाणी पंद्रह दिन लंदन में रहकर हाल ही में स्वदेश लौटी हैं।
कम से कम एक सासंद तो हो
पिछले सप्ताह भारतीय जनशक्ति पार्टी की अध्यक्ष उमा भारती ने लालकृष्ण आडवाणी से मिलकर अपनी पार्टी को एनडीए (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) में शामिल करने का प्रस्ताव रखा तो वह दो कारणों से नहीं हो पाया। एक तो एनडीए के संयोजक शरद यादव ने बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी के नुकसान का वास्ता देकर इसका पुरजोर विरोध किया। दूसरे, उमा भारती को बताया गया कि एनडीए अलग-अलग पार्टियों के संसदीय दलों का गठबंधन है जिसके लिए पार्टी का कम से कम एक सासंद तो होना ही चाहिए। चूंकि उनकी पार्टी का एक भी सदस्य संसद में नहीं है, इसलिए उन्हें एनडीए में शामिल कर पाना मुश्किल है।
एक लेख से उपजा असमंजस
देश भर में एक ओर माओवादी गतिविधियां तो दूसरी ओर उनके खिलाफ सरकार का अभियान चल रहा है। खासकर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने माओवादी हिंसा के खिलाफ तीव्र और आक्रामक अभियान छेड़ रखा है। इस अभियान को हाल ही में हल्का-सा प्रतिरोध तब मिला जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का एक लेख एक दैनिक में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने माओवादी हिंसा के कारगर समाधान के रूप में राजनीतिक संवाद और समाज-आर्थिक विकास की पैरवी की। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय माओवादियों के खिलाफ अपने आक्रामक पुलिस अभियान को लेकर थोड़ा असमंजस में पड़ गया। यह असमंजस कब खत्म होगा, कहना मुश्किल है।










