लापरवाही से मरते हैं बच्चेः रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र. यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, शिशु मृत्यु दर में गिरावट के बावजूद भारत में प्रति दिन पांच वर्ष से कम उम्र (यू-5) के 5,000 बच्चों की मौत ऐसे कारणों से होती है, जिन्हें टाला जा सकता है। इसके साथ ही, भारत का नाम उन 50 शीर्ष देशों की सूची में है, जहां यू-5 बच्चों की मृत्यु दर काफी अधिक है।
यूनिसेफ ने भारत को 49वां स्थान दिया है जबकि अफगानिस्तान यू-5 की मौत के मामले में पहले स्थान पर है। दुनिया के 193 देशों को लेकर बनाई गई इस रिपोर्ट में अमेरिका को 149वां तथा ब्रिटेन को 158वां स्थान मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के स्कूल जाने योग्य बच्चों में से करीब 10 करोड़ बच्चों का नाम प्राइमरी स्कूल में नहीं लिखाया गया है।
ऐसे बच्चों में लड़कियों की तादाद ज्यादा है। रिपोर्ट में 5 से 14 वर्ष के बाल श्रमिकों की संख्या करीब 15 करोड़ बताई गई है। यूनिसेफ प्रमुख ए वेनेमन ने कहा, ‘यह ठीक नहीं लगता है कि बच्चे ऐसे कारणों से मौत के मुंह में समा रहे हैं जिन्हें दूर किया जा सकता है। बच्चों की मौत के प्रमुख कारण निमोनिया, मलेरिया, खसरा तथा कुपोषण हैं।’ रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में 24,000 से अधिक यू-5 बच्चे प्रति दिन ऐसे कारणों से मौत का शिकार बनते हैं जिन्हें टाला जा सकता है।
हिंसा और र्दुव्यवहार: रिपोर्ट के अनुसार हर साल 50 करोड़ से 1.5 अरब बच्चे हिंसा और र्दुव्यवहार का शिकार होते हैं। पांच साल से कम उम्र के करीब 14 करोड़ बच्चे कम वजन के हैं।
मतभेदों में अटकी अनिवार्य शिक्षा योजना
छह से 14 साल के सभी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने की यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मतभेदों में उलझी हुई है। अभी इसपर सहमति नहीं बन पा रही है कि खर्च होने वाली राशि का कितना हिस्सा कौन खर्च करेगा। कई राज्य सरकारें इसमें कांग्रेस की राजनीतिक मंशा भी देख रही हैं। इससे वे इस योजना को समर्थन देने के लिए आगे नहीं आना चाहती हैं।
सूत्रों के मुताबिक संसाधनों की कमी को देखते हुए योजना आयोग ने इस योजना पर खर्च की जाने वाली राशि के एक हिस्से के लिए राज्य सरकारों को उत्तरदायी बनाने की सलाह दी है। आयोग की सलाह है कि राज्य सरकार ये हिस्सा तीन चरणों में अगले पांच साल तक दें। योजना आयोग ने कहा है कि पहले चरण में खर्च में 40 प्रतिशत दूसरे चरण में 45 व तीसरे में 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य वहन करें। शेष राशि केंद्र सरकार द्वारा वहन की जाए।
सूत्रों के मुताबिक योजना आयोग का मानना है कि इस योजना के लिए वह करीब 1,42,000 करोड़ रुपए जुटा सकता है। जबकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मानना है कि इस योजना पर करीब 1,74,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे।










