विवाद सुलझा, मूर्तियां म्यूजियम में
रायपुर. हीरापुर में नाली खुदाई के दौरान मिलीं सभी पांचों मूर्तियां पुरातत्व को सौंप दी र्गई। पुरातत्वविदों की समझाइश के बाद बड़ी मुश्किल से तीन महीने बाद बस्ती वाले ऐतिहासिक महत्व की मूर्तियों के हस्तांतरण पर राजी हुए। इन्हें दो-तीन दिनों पहले महंत घासीदास संग्रहालय की सिरपुर दीर्घा में प्रदर्शित कर दिया गया।
कलचुरी कालीन (12वीं शताब्दी) शिव परिवार की कार्तिकेय, गौरी, लज्जा गौर और मुखशिव लिंग प्रतिमाओं को लेकर विवाद पैदा हो गया था। मोहल्ले वालों ने निजी संपत्ति मानकर ऐतिहासिक महत्व की इन मूर्तियों को न केवल हस्तांतरित करने से इनकार कर दिया बल्कि मोहल्ले में मंदिर बनाने का ऐलान कर दिया। सरकार से आर्थिक मदद की गुहार भी लगाई थी। उन्हें कायदे कानून का हवाला देकर पुरातत्व विभाग के अधिकारी ही नहीं पुलिस वालों ने काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। एक-दो बार अधिकारी खाली हाथ लौट थे।
किसी तरह का तनाव उत्पन्न न हो जाए इसलिए अधिकारी कोई सख्ती करने के पक्ष में नहीं थे। हताश अधिकारी दो ढाई महीने तक शांत रहे। इस दौरान मोहल्ले वालों ने इन्हें सामुदायिक भवन में सुरक्षित कर रखा था। वे इनकी पूजा आराधना भी करने लगे थे। महंत घासीदास संग्रहालय के अध्यक्ष जेआर भगत और वरिष्ठ पुरातत्वविद् जीएल रायकवार ने सप्ताहभर पूर्व इस दिशा में एक बार फिर प्रयास शुरू किए।
आखिर कर उनकी कोशिश रंग लाई। मोहल्ले वालों के बीच सहमति बन गई। संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के आयुक्त राजीव श्रीवास्तव चर्चा से बाद मूर्तियों को लाने विभागीय टीम भेजी गई। म्यूजियम की खास दीर्घा में संग्रहित करने के बाद ये मूर्तियां पुरातत्व के शोधकर्ताओं और रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
पहली बार एक साथ मिला शिव परिवार : पुराविदों का मानना है कि खारून का तटवर्ती इलाका होने की वजह से प्राचीन काल में यह आवासीय क्षेत्र रहा होगा। प्रतिमाओं के साथ सिलबट्टे का एक टुकड़ा भी मिला है। श्री रायकवार ने बताया कि छत्तीसगढ़ में पहली बार एक साथ शिव परिवार की पांच मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इनका उपासना में बहुत महत्व था। कोई संतान प्राप्ति के लिए तो कोई ग्रह दोष दूर करने के लिए इनकी पूजा करता था।
एकमुखी शिवलिंग की ऊंचाई 9 इंच है, जो इससे पहले केवल मल्हार में मिला था। इसके अलावा साफ सेंड स्टोन व लाल बलुआ पत्थर से निर्मित गौरी, लज्जा गौरी और कार्तिकेय की मूर्तियां भी लगभग इतनी ही ऊंची हैं।










