Saturday, Nov 21st, 2009, 3:46 am [IST]  

danik bhaskarसमझदार बुद्धू बक्सा

शरबानी बैनर्जी/प्र

भोपाल. एक समय था जब ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर सीमित समय के लिए सीमित चैनलों पर धीमी गति के कार्यक्रम दर्शकों के लिए उपलब्ध होते थे लेकिन आज अनगिनत कलरफुल चैनल, डिजिटल क्वालिटी और साउंड के साथ टीवी कई प्रोग्राम घर-घर में देखे जा रहे हैं।



बिना कि सी व्यवधान के सेटेलाइट से प्रोग्राम देखने के लिए अब शहरवासी डीटीएच(डायरेक्ट टू होम) सेवाएं ले रहे हैं। इसमें मनोरंजक कार्यक्रम ही नहीं बल्कि नए फीचर्स में बच्चों के लिए एक्टिव लर्निग सॉल्यूशन्स तक शामिल किए गए हैं ताकि यह एंटरटेनमेंट के साथ ही एजुकेशन का जरिया भी बन सके। तभी तो कहा जा रहा हैं, ‘इसे लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला.. या विश करो, डिश करो...।’



नए अनुभवों के साथ



साकेत नगर में रहने वाली मंजू मित्तल कहती हैं कि टेलीविजन देखना अब पहले से अलग अनुभव हो गया है अब ये हमारी मर्जी से चलता है। रिमोट की बैटरी कमजोर भी हो जाए तो टीवी अपने आप बता देती है। अगर बिजली चली भी जाए तो आपका पसंदीदा प्रोग्राम मिस नहीं होगा क्योंकि बिजली आने पर वहीं से प्रोग्राम शुरू होगा जहां से छूटा था। इंस्टेंट अपडेट या घटनाएं भी बिना न्यूज चैनल पर जाए ही कार्यक्रम के बीच में पॉप-अप के रूप में डिस्प्ले होने लगती हैं।



सालों साल देखे डेली सोप



पारस सिटी में रहने वाली शालिनी गुप्ता कहती हैं कि सास भी कभी बहू थी और कहानी घर-घर की जैसे डेली सोप महिलाओं ने सालों-साल देखे। कॉलोनियों में उस वक्त सन्नाटा देखा है जब ये दोनों डेली सोप टीवी पर आते थे। टेलीविजन न सिर्फ मनोरंजन कर रहा है बल्कि सूचनाओं का भंडार भी बन गया है।



इन्होंने किया पॉपुलर



दूरदर्शन पर प्रसारित सीरियलों ने टीवी के महत्व को दोगुना कर दिया था। इस क्रांति की शुरूआत 1984 में भारतीय टेलीविजन के पहले सोप ओपेरा ‘हमलोग’ ने की। 1986 में आए ‘बुनियाद’, 1987 में आए ‘तमस’ आदि सीरियलों ने दर्शकों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया।



घर-घर पहुंची टीवी



टीवी को भारत में मुख्य रूप से 1982 में हुए एशियाड के समय खास पहचान मिली। यह वो दौर था जब घर-घर में टीवी की मांग होने लगी थी। दूरदर्शन पर हर रविवार शाम को आने वाली मूवी पूरे परिवार का ही नहीं
बल्कि आस-पड़ोस के लोगों के लिए भी आकर्षण का
केंद्र होती थी।



रामायण और महाभारत



रामानंद सागर द्वारा निर्मित ‘रामायण’ ने इतनी प्रसिद्धि पाई कि लोगों ने टीवी की ही पूजा करनी शुरू कर दी। 1988 में शुरू हुए बीआर चोपड़ा के ‘महाभारत’ ने लोगों को ऐसा बांधा कि इनके टेलीकास्ट के वक्त सड़कें सूनी रहने लगीं।

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