न पूरा राशन, न ही पौष्टिकता
पानीपत. बेशक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकारी स्कूलों में मिड—डे मील योजना में दाल और अन्य पदार्थों की मात्रा बढ़ाने की घोषणा की हो, लेकिन योजना की वास्तविकता पर नजर डाली जाए तो स्थिति गंभीर है। या ये कहें कि मिड-डे मील योजना का पांच साल में ही ढांचा डगमगा गया है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
स्कूलों की स्टोर से कभी गेहूं, चावल खत्म हो जाता है तो कभी इंचार्ज को हरी सब्जी और फ्यूल का जुगाड़ करने के लिए उधार का सहारा लेना पड़ता है। अधिकारी हैं कि केंद्र सरकार की योजना का टका सा जवाब देकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। अधिकारियों की अनदेखी से जिले के 88500 सहित प्रदेश के करीब साढ़े सत्रह लाख स्कूली बच्चों को कई बार मिड—डे मील को तरसना पड़ता है।
पांच साल में ही डगमगाया
केंद्र सरकार के निर्देश पर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2004 में राजकीय प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिड—डे मील देना शुरू किया था। योजना नई होने पर सरकार ने प्रदेश के सभी स्कूलों में राशन और सामान समय पर पहुंचना शुरू कर दिया। बच्चों और अभिभावकों ने भी मिड—डे मील का पूरा आनंद लिया। इसी के आधार पर वर्ष 2008 में प्रदेश सरकार ने छठी से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को मिड डे मील देने का फैसला लिया।
नया रूप भी बिगड़ा
प्रदेश सरकार ने चालू वर्ष के प्रारंभ में मिड डे मील योजना को नया रूप दिया था। सरकार की नई योजना के अनुसार स्कूलों में गेहूं और चावल विभाग द्वारा सीधे दिए जाने है। बाकी आइटम का मील इंचार्ज को पैसा दिया जाना है। नए रूप के बाद भी योजना की हालत ढाक के तीन पात वाली है।
रख-रखाव का ही साधन नहीं
स्कूलों में गेहूं और चावल रखरखाव के लिए प्रत्येक स्कूल में एक-एक क्विंटल की चार—चार टंकी दी गई। स्कूलों में माहभर मिलने वाला गेहूं और चावल टंकियों में नहीं आता। इंचार्ज को मजबूरीवश राशन को फर्श पर रखना पड़ता है। कई बार चूहे राशन चट कर जाते हैं और कई बार राशन को फफूंद भी लग जाता है।
ईंधन और कुक पर मार
योजना शुरू होने के समय लकड़ी दो सौ रुपए प्रति क्विंटल थी। एक क्विंटल ईंधन का भाव अब बढ़कर 700 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। पांच साल में ईंधन तीन गुना से अधिक महंगा हो गया है, जबकि ईंधन का प्रति बच्च आज भी 20 पैसे मिलता है। यही हाल कुक का है। कुक को आज भी 40 पैसे प्रति बच्च मिलता है।
रसोई नहीं बन पाई
मिड डे मील योजना के लागू होने के पांच वर्ष बाद आज तक स्कूलों में रसोई नहीं बन पाई। रसोई न होने से मजबूरीवश गेराज, कमरों या खुले में राशन बनाना पड़ता है। खुले में खाना बनाने से कुछ भी गिरने की चिंता लगी रहती है।
मिड डे मील केंद्र सरकार की योजना है। केंद्र से निदेशालय के माध्यम से राशन और राशि मिलते ही स्कूलों में भेज दी जाती है। योजना में सुधार की समय—समय पर उच्च अधिकारियों को अवगत करा दिया जाता है। - उदय प्रताप सिंह, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी










