टेलीविजन ने बदली जीवनशैली
हिसार. याद कीजिए वो दिन, जब हमलोग, बुनियाद, नुक्कड़, ये जो है जिंदगी, चित्रहार जैसे कार्यक्रमों को देखने के लिए उन घरों के बाहर भीड़ लग जाती थी, जहां पर टेलीविजन होता था। अब शायद ही ऐसा कोई घर बचा होगा, जहां टेलीविजन नहीं। अब रंगीन टेलीविजन की जगह एलसीडी लेने लगे हैं। केबल की जगह डीटीएच सर्विस लेती जा रही है। आईपी टीवी भी अपने चलन के इंतजार में है।
70 के दशक में आए टेलीविजन
सत्तर के दशक में हिसार शहर में ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन आए। 1977-78 में लोग दिल्ली से टेलीविजन खरीद लाए थे। गिने-चुने लोगों के घरों में टेलीविजन थे। इनमें फिरोजी लाल जैन व बलदेव तायल जैसे परिवार शामिल हैं। उस समय हिसार में टेलीविजन को मसूरी में लगे रिले सेंटर के सिग्नल मिला करते थे। सिग्नल के लिए लोग घर की छत पर 60 से 70 फुट ऊंचा एंटीना और बूस्टर लगाते थे। 1982 में दिल्ली में एशियन गेम्स का रंगीन प्रसारण शुरू करने की बात आई तो देश में रंगीन टेलीविजन का दौर शुरू हुआ।
हिसार में रिले सेंटर
हिसार में 7 जुलाई 1984 को रिले सेंटर का उद्घाटन हुआ। इसके एक सप्ताह पहले हिसार में महेंद्र बांगा नामक व्यक्ति ने हिसार में टेलीविजन की दुकान खोली। उनसे सबसे पहले हिसार के डॉ. एसके सोनी ने टेलीविजन खरीदा। बांगा के अनुसार हिसार में रिले सेंटर शुरू होने के बाद टेलीविजन खरीदने का चलन बढ़ा।
टीवी ने हिसार को बनाया आधुनिक
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में समाजशास्त्र की प्राध्यापिका डॉ. शकुंतला नांदल के अनुसार टेलीविजन से पहले लोगों का ज्ञान सीमित था। टेलीविजन का चलन बढ़ने से देश-दुनिया की जानकारी मिलने लगी। आधुनिकता प्रवेश करने लगी। रोजगार के नए-नए साधनों का पता लगने लगा। यहां के लोग विदेश तक पहुंच गए।
नब्बे के दशक में निजी चैनलों के आने से बदलाव में तेजी आई। न्यूज चैनलों से देश-विदेश की घटनाओं की तुरंत जानकारी मिलने लगी। लोगों का रहन-सहन भी बदला। लोग पारंपरिक कपड़ों के बजाए आधुनिक फैशनेबल कपड़े पहनने लगे। बच्चों को एक्सपोजर मिला। खराब पहलू यह रहा कि आधुनिकता के साथ पाश्चात्य संस्कृति की तरफ बढ़ने पर अपनी सभ्यता व संस्कृति से दूर होते चले गए। नैतिक मूल्यों में भी गिरावट आई।
समझदारी से देखें टीवी
बिश्नोई कॉलोनी निवासी दिलबाग सिंह के अनुसार टेलीविजन ने समाज को काफी फायदा पहुंचाया है। टेलीविजन के काफी कार्यक्रम भारतीय संस्कृति को दूषित करने में लगे हुए हैं। टेलीविजन में कई बार अश्लीलता परोसी जाती है। जो सभ्य समाज के लिए हानिकारक है। इसके अलावा टेलीविजन ने बच्चों को बड़े-बुजुर्र्गो से दूर किया है।
अब बच्चे दादा-दादी के पास बैठने के बजाए टेलीविजन के सामने ही बैठे रहते हैं। इससे उनकी आंखों पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। टेलीविजन से हिंसा को भी बढ़ावा मिल रहा है। सास-बहू के धारावाहिक रिश्तों में दरार डालने का काम कर रहे हैं।
टीवी की दूषित संस्कृति से बचने के लिए टीवी पर देखे जाने वाल कार्यक्रमों की प्राथमिकता तय करनी जरूरी है। बच्चों को टीवी देखने का खुला अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। रिश्तों की कीमत पर मनोरंजन का मजा नहीं लिया जाना चाहिए।
मेरी पसंद
मुझे कुमकुम सीरियल पसंद था। वर्तमान नाटकों में बालिका वधू काफी अच्छा नाटक है। इसकी कहानी काफी हटकर है और मन को छूने वाली है। पुराने धारावाहिकों में बुनियाद अच्छा लगता था। आजकल के धारावाहिकों में पवित्र रिश्ता नामक सीरियल काफी अच्छा लगता है। ये धारावाहिक परिवार में रिश्तों के महत्व को बताता है।
ब्लैक एंड व्हाइट के वे रंगीन दिन
अस्सी के दशक की शुरूआत में मेरे घर ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आ गया था। शाम को जब धारावाहिकों का प्रसारण होता था तो घर के बाहर गली तक देखने वालों का मजमा लग जाता था। उस वक्त हमलोग, नुक्कड़, बुनियाद, ये जो है जिंदगी जैसे धारावाहिक खूब देखते थे। दुकान बंद करके सीधे घर जाते थे और परिवार के साथ टीवी के सामने बैठ जाते थे।










