Saturday, Nov 21st, 2009, 11:50 am [IST]  

danik bhaskarरूमाल का बनाते थे थाइपैड

रिप्पल क्रिस्टी

sunil gavaskarअहमदाबाद. लिटिल मास्टर सुनील गावसकर ने आज और पहले के क्रिकेट में अंतर की रोचक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में क्रिकेटरों को सभी प्रकार के क्रिकेट गियर्स मिल रहे हैं लेकिन हमारे जमाने में थाइपैड भी नहीं था।



हम होल्डिंग ,गार्नर,रॉबर्ट्स सहित दुनिया के खतरनाक गेंदबाजों की गेंदों से बचने के लिए हाथ साफ करने के रूमाल का थाइपैड बनाते थे। इस प्रकार से हम जांघ के भाग को गेंद की चोट से बचाने का प्रयास करते थे।



इसके अलावा रबर के डॉट्सवाले बैटिंग्स ग्लब्स का भी उपयोग करते थे। हमारे जमाने में चेस्ट पैड भी नहीं थे। ऑस्ट्रेलिया या वेस्टइंडीज में खासतौर पर जहां गेंद अधिक स्विंग होती है, वहां और इंग्लैंड में अधिक स्वेटर पहनते थे जो मोटे होने के कारण चेस्ट पैड की जरुरत पूरी करते थे। अब यह स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है।



आज मसाजर और फिजियो भी



गावसकर ने कहा कि आज दिन में खेल के बाद खिलाड़ियों को फिजियो या मसाजर मिल जाते हैं। उस समय जब टीम बड़ा स्कोर करती थी तब लागातार दो दिनों तक फील्डिंग भी करनी पड़ती थी। इस दौरान थकान दूर करने के लिए खुद व्यवस्था करनी पड़ती थी।



आज फिटनेस ट्रेनर ,मसाजर सहित टीम के विभिन्न प्रकार के सहायक कर्मी होते हैं। कमेंटेटर के रूप में अनुभव के संबंध में गावसकर ने बताया कि व्यस्तता के कारण कई दिनों तक घर नहीं जा पाते हैं। जब माहौल खराब होता है तब घर की याद बहुत आती है। जिस प्रकार से जख्म क्रिकेट का एक हिस्सा है ,उसी प्रकार से बार-बार प्रवास भी क मेंटेटर की जिंदगी का एक हिस्सा बन जाता है।



रनिंग के लिए 66 यार्ड का उपयोग: फिटनेस के संबंध में गावसकर ने बताया कि वे कभी भी पूरे मैदान का चक्कर नहीं लगाते थे। वे हमेशा पैड पहनकर मात्र 66 यार्ड का रनिंग बिटविन द विकेट करते थे। यह रनिंग लंबे समय तक रहता था और इसी प्रकार से फिटनेस को बनाए रखते थे।

  share
apne vichaar
post a comment
name:
email:
select your language:     Hindi Roman     Hindi Phonetic     English
comment:
code: