विदेशी तकनीक से होगी वैकल्पिक खेती!
कुल्लू. भांग का कलंक ढोने वाले यहां के वाशिंदों के जीवनस्तर को बदलने के लिए अब विदेशी तकनीक टटोली जा रही है। विदेशी राष्ट्र भी यहां से भांग का उन्मूलन करने के लिए आगे आए हैं। अगर महाप्रयोग सफल रहा तो कुल्लू से भांग का नामोनिशान मिट सकता है। इसके लिए यहां के लोगों की सोच को भी विकसित किया जा रहा है। इसके बारे में कुल्लू में एक सम्मेलन का भी आयोजन किया गया।
यूनाईटेड नेशन आफिस ड्रग्स एंड क्राईम की क्रिश्चन अल्ब्रीटीज ने पहली बार भारत आकर इसमें हिस्सा लिया। उनका मानना है कि भांग के मामले में मलाणा क्रीम का नाम विदेशों तक पहुंचा है। उसे उगाने का काम यहां के वाशिंदे ही बखूबी कर रहे हैं। इसके पीछे कुछ विदेशी हाथ भी है।
20 सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ में नशा, क्राईम व बुराईयों पर लगाम कसने वाली क्रिश्चन का कहना है कि अगर भांग और अफीम की खेती का क्रम ऐसा ही जारी रहा तो संभावना जताई जा रही है कि अफीम के लिए दागदार अफगानिस्तान, म्यंबर व लाओ की पांत में भारत भी काबिज हो जायेगा।
एक चैनल का हवाला देते हुए कहा कि पंजाब विश्वविद्यालय में ३क्-४क् फीसदी छात्र भांग और अफीम का सेवन करते हैं। जिससे क्राइम अधिक हो रहा है। ऐसे नशीले पदार्थो का नशा करने से हवस बढ़ती है नतीजतन एड्स का आंकड़ा भी अधिक हो जाता है। चुराह वैली को-ऑपरेटिव समिति के अध्यक्ष जगदीश शर्मा कहते हैं कि चुराह के लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया गया है।
जिससे यहां के वाशिंदे फूल उगाने लगे हैं। चुराह के फूल हॉलैंड फेस्टिवल में भी दिखे थे। दिल्ली, चंडीगढ़ के साथ इनके अंतर्राष्ट्रीय मार्किट तैयार हो चुकी है। पालमपुर यूनिर्सिटी के उपकुलपति डॉ. तेज प्रताप का कहना है कि समय के साथ खेती में भी विकल्पता तलाशनी होगी।
चरस के कंलक को मिटाना होगा। सब्जियां, फूल व फलों की नई किस्में इजाद हो चुकी है। जो चरस के मुकाबले यहां के लोगों की आर्थिकी में इजाफा कर सकती है।
मलाणा वैकल्पिक समिति के एडवाजर ओपी शर्मा कहते हैं कि हालांकि यहां के लोगों के चरस के कारोबार को छोड़ दिया है लेकिन पीठ के पीछे कई ठिकानों पर यह अभी भी ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। लेकिन इनके हर क्रिया-क्लापों पर निगाहें रखी हुई है।










