चोरी हुई नहीं, पंजाब पुलिस ने ‘चोर’ पकड़ा
नाभा. लोग अक्सर पंजाब पुलिस के ढीलेपन की शिकायतें करते हैं पर नाभा का मेवा खान पंजाब पुलिस की फुर्ती का शिकार हो गया। 55 साल के खान को पुलिस ने चोरी के इल्Êाम में जेल में डाल दिया। जब बेकसूर मेवा खान ने Êामानत कराने से इनकार कर दिया तो पुलिस की हवा निकल गई।
फिर किसी अनजान आदमी से खान का बेल बॉन्ड भरवा कर उसे जबरन जेल से निकाल लिया। पुलिस ने यह भी कह दिया कि वह बेकसूर है लेकिन उसने दिहाड़ी करने वाले वाले मेवा खान की जि़दगी के 27 दिन छीन लिए। मेवा खान की रोÊाी- रोटी का एकमात्र Êारिया उसकी रेहड़ी है।
आठ अक्टूबर की दोपहर रेहड़ी लेकर वह नाभा के पटियाला गेट पर खड़ा था जब पास के सरकारी मॉडल स्कूल के एक कर्मचारी ने उससे पूछा कि क्या वह स्कूल से गेहूं की बोरियां आटा चक्की तक पहुंचा देगा। एक फेरे के 30 रुपए तय हुए और मेवा गेहूं ढोने लगा।
स्कूल के बच्चों ने रेहड़ी पर बोरे रखने में मदद की। जब वह पांच बोरियों की दूसरी खेप लेकर चक्की पर पहुंचा, तो पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले गई। उसने जानना चाहा कि उसका क्या कसूर है, तो कहा गया, कुछ नहीं।
पर एक घंटे के भीतर पुलिस ने मिड- डे मील का गेहूं चुराने के आरोप में उसके खिलाफ पर्चा बना दिया। धारा 409, 379-7(1) के अतर्गत दायर पर्चे में एक अध्यापक हरपाल सिंह का नाम भी डाला गया लेकिन पुलिस ने उस अध्यापक से बात करने की Êाहमत भी नहीं उठाई। जिस स्कूल का गेहूं था वहां के प्रिंसिपल या छात्रों से भी कोई बात नहीं की। ..शेष पेज 8 पर
पुलिस ने मेवा खान को तुरत-फुरत अदालत में पेश कर रिमांड की अर्जी डाल दी लेकिन अदालत ने रिमांड देना मुनासिब नहीं समझा और मेवा खान को न्यायिक हिरासत में नाभा सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
अपनी रेहड़ी के साथ तीस रुपए के दो चक्कर लगाने निकला खान इस नए चक्कर से अचंभित था। इधर उसकी आमदनी पर निर्भर उसके परिवार वाले और पड़ोसियों ने नाभा के डीएसपी से गुहार लगाई, तो उन्हें कहा गया कि बेकसूर मेवा को जमानत मिल जाएगी।
जब परिवार वालों ने मेवा को यह बात बताई, तो उसने कसम खा ली कि वह जमानत नहीं मांगेगा। ‘मैं अगर बेकसूर हूं तो मुझे बरी करो, यह मुकदमा वापस लो और मुझे जमानत चाहिए ही नहीं, यह मैंने साफ कर दिया।’ मेवा खान ने भास्कर को बताया। पर घरवालों को मेवा की जेल में Êिांदगी की चिंता सता रही थी।
बेल बॉन्ड के लिए दस हÊार रुपए की दरकार थी। मेवा खान ने परिवार से कह दिया कि वे बेल बॉन्ड नहीं भरें। ‘मैं गरीब आदमी हूं। दस हज़ार किस बात के, जब मैं अपना काम कर रहा था, चोरी नहीं।’
मेवा खान यह कहते कहते फिर से तमतमा जाता है। फिर अचानक तीन नवंबर की शाम एक जेल कर्मी ने उससे कहा कि उसके रिलीÊा ऑर्डर आ गए हैं और उसे आज़ाद किया जा रहा है। हैरान मेवा समझ नहीं पाया कि दस हÊार किसने भरे।
बॉन्ड भरने वाले थूही गांव के हरविंदर सिंह को तो वह जानता भी नहीं। सात तारीख को पुलिस ने अदालत में कहा कि मेवा खान बेकसूर है और उसके खिलाफ मामला पुलिस वापस ले रही है। स्कूल प्रिंसिपल बलबीर कौर साहनी शुरू से कहती रहीं, ‘चोरी तो हुई ही नहीं।
मिड डे मील के लिए गेहूं की पिसाई स्कूल अध्यापकों के निरीक्षण में होती है। पुलिस ने केस दर्ज करने से पहले स्कूल के किसी सदस्य से बात नहीं की। 700 से ऊपर छात्रों और इतने टीचर्स के सामने चोरी कैसे हो सकती है?’
भास्कर ने जब केस के जांच अधिकारी से बात की तो उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि चोरी के मामले में स्कूलके अध्यापकों से बात क्यों नहीं की गई। मेवा खान तो यह जानना ही नहीं चाहता। उसका सवाल सीधा है, ‘मुझे मेरे 27 दिन कौन वापस देगा?’










