योजना बंद, बजट बन गया
पारंपरिक बेरियों का बेरी
जैसलमेर & हर बार अकाल की विभिषिका झेलने वाले जैसलमेर जिले में स्थित बेरियां उपेक्षा का दंश भोग रही है। कभी जीवनदायिनी कहलाने वाली ये बेरियां अपना अस्तित्व तक खोती जा रही है। बेरियों के संरक्षण के लिए शुरू हुई राजीव गांधी मिशन योजना बजट के अभाव में दम तोड़ से इनका जीर्णोद्वार बीच में ही रुक गया और वर्तमान में ये बदहाल स्थिति में पहुंच गई है। जिले में हर तरफ पेयजल संकट बना हुआ है लेकिन सरकारी स्तर पर आज तक दोबारा बेरियों के जीर्णोद्वार की मुहिम नहीं चलाई गई। संरक्षण की दरकार में इन बेरियों का अस्तित्व संकट में पहुंच चुका है।
दम तोड़ गई संरक्षण की योजना : राज्य सरकार की राजीव गांधी मिशन योजना फलीभूत नहीं हो पाई। यह योजना वर्ष 2001 में शुरू हुई थी और बजट के अभाव में 2005 में दम तोड़ गई। नौ वर्ष पूर्व शुरू हुई इस योजना के तहत जिले में स्थित बेरियों का संरक्षण होना था लेकिन बजट के अभाव में योजना बीच में ही खटाई में पड़ गई। इस योजना से पूर्व राज्य सरकार ने करीब चार करोड़ रुपए खर्च कर बेरियों का संरक्षण भी किया था। बाद में शुरू हुई राजीव गांधी मिशन योजना सिरे नहीं चढ़ पाई और पर्याप्त संरक्षण नहीं हो पाने से बेरियों की स्थिति अब फिर से बदतर होती जा रही है।
तीन हजार बेरियां रेत से अटी : एक अनुमान के मुताबिक जिले में 5 हजार बेरियां है। जिसमें तीन हजार से अधिक बेरियां सार संभाल के अभाव में रेत से अटी पड़ी है। बेरियों को संरक्षण नहीं मिलने से धीरे-=धीरे ये बेरियां जमींदोज होती जा रही है। रेतीली आंधियों की वजह से तथा संरक्षण नहीं होने से बेरियों में रेत भर चुकी है और वे अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
हजारों लोगों के हलक तर करती थी ये बेरियां : जैसलमेर में प्राचीन समय में घी से भी ज्यादा पानी का मोल था। यहां आने को काले पानी की सजा माना जाता था। दूर-दूर तक रेत का समंदर था। लेकिन इस रेत के समंदर के बीच कई जीवनदायनियां भी थी जिससे लोग हलक तर करते थे। पानी का एक मात्र साधन गांव में स्थित बेरियां होती थी। अब ये पांरपरिक पेयजल स्रोत अपना वजूद खो चुके हैं।
विरासत मानी जाती थी ये बेरियां : लोगों की प्यास बुझाने वाली इन बेरियों को रियासतकाल में विरासत का दर्जा हासिल था। पेयजल का एकमात्र साधन होने की वजह से इन्हें विरासत माना गया था। लेकिन बाद में इनका संरक्षण नहीं होने से विरासत समाप्त होने के कगार तक पहुंच गई । सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास नहीं किए जाने से विरासत मानी जाने वाली बेरियों का अस्तित्व नष्ट होने के कगार पर है।
जीर्णोद्वार से हो सकता है पेयजल समस्या का स्थाई समाधान : जिले के विभिन्न गांवों व ढाणियों में स्थित पारंपरिक पेयजल स्रोतों के जीर्णोद्वार से पेयजल समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित इन बेरियों में पानी का अथाह भंडार है। और तो और इस पानी को शुद्ध भी माना जाता है। वर्तमान में जिले के सैकड़ों गांवों व ढाणियों में पेजयल समस्या बनी हुई है। जलदाय विभाग हर जगह पानी पहुंचाने में नाकाम साबित हो रहा है। जिसके चलते लोगों को मजबूरी में महंगे दामों में पानी का इंतजाम करना पड़ रहा है।
यह है वर्तमान स्थिति : वर्तमान में कुछ एक गांवों की बेरियों को छोड़कर लगभग अधिकतर रेत से अटी पड़ी है। जानकारी के अनुसार जिले के रामगढ़, नेतसी, साधना, खुईयाला, गिरदूवाला, साधेवाला, ईसावल तला, लंगतला, तनोट, घंटियाली, रणाऊ, किशनगढ़ सहित सीमावर्ती एरिया तो पूरी तरह से बेरियों पर ही निर्भर था लेकिन वर्तमान में इन बेरियों का अस्तित्व संकट में है। इसके अलावा जिले के सोढ़ाण क्षेत्र, सम क्षेत्र, सांकड़ा क्षेत्र, मोहनगढ़ व आसपास के गांवों व ढाणियों में स्थित भारी संख्या में बेरियां अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
ञ्चपारंपरिक पेयजल स्रोत फिर से जीवनदायक साबित हो सकता है। इसके लिए सरकार को विशेष योजना चालू करनी चाहिए ताकि लोगों की पेयजल समस्या का स्थाई समाधान हो सके। वर्तमान में इन बेरियों की स्थिति बहुत ही दयनीय है।
रावतसिंह, सरपंच, खींवसर
ञ्च प्राचीन जलस्रोत अभी भी प्यास बुझाने में सक्षम है। वर्तमान में तो कोई ऐसी योजना नहीं है। नरेगा का आगामी वर्ष के लिए जो प्लान बना है हो सकता है उसमें बेरियों के लिए कुछ हो। इसके अलावा वृहद स्तर पर यदि बेरियों का सर्वे कर योजना का प्रारूप बनाया जाए और जनप्रतिनिधि प्रयास करे तो राज्य सरकार से बजट मिल सकता है।
जे.सी. पुरोहित, मुख्य कार्यकारी अधिकारी



