हमीरपुर. संत-महात्माओं की तपोस्थली रह चुके नजदीकी इलाके के जमलीधाम मंदिर में 200 साल पुरानी महाभागवत गीता की किताब मिली है। जिस पर इन दिनों मंदिर के पुजारी अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर इस गीता में क्या-क्या लिखा गया है, इस पर शोध भी होगा। विशेषज्ञ एवं महात्मा परमहंस प्रणवानंद का कहना है कि इस गीता का विषय लीपोलॉजी है। जो संभवत: मेडीटेशन और ध्यान लगाने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि यह स्थान उत्तर भारत के संतों के लिए मेडीटेशन का केंद्र रहा होगा। इस बात के प्रमाण पहले मंदिर में की गई खुदाई के दौरान भी मिल चुके हैं। किताब मंदिर की उस जगह से मिली है जहां सैकड़ों वर्ष पहले का निर्मित राधा-कृष्ण का मंदिर निर्मित है। उस मंदिर में बीते कुछ माह पहले पुजारी सफाई कर रहे थे, तो एक सेल्फ पर यह किताब धूल से लिपटी पड़ी मिली। उस समय तो इस किताब को साधारण रूप दिया जा रहा था लेकिन बीते दिनों जब इस किताब को ध्यान से पड़ा गया तो उसका इतिहास सैकड़ों वर्ष पहले से जुड़ने लगा।
हर भाषा की गीता का होगा संग्रह
बंगाल के दमदम जगह पर जन्में स्वामी परमहंस प्रणवानंद इन दिनों हिंदोस्थान की सभी भाषाओं में लिखित महाभागवत गीता किताबों का संग्रह एकत्रित करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में जो किताब उन्हें मिली है, इससे जाहिर होता है कि देश की कई भाषाओं में इसका रूपांतर है। परमहंस के मुताबिक वे इस मंदिर में तीन साल पूर्व ही आए हैं, इससे पहले वे दंगड़ी में स्थित मंदिर में रहते थे। वे हर जगह रहे, लेकिन जमलीधाम में उन्हें जो खास लगा वह है ध्यान और मेडीटेशन लगाने के लिए उपयुक्त स्थान।
पूर्व में यहां रहे संतों और महात्माओं जिनमें महागौरी अन्नदाता और मृत्यूंच्य महादेच का नाम लेकर यदि सच्चे मन से कोई मुराद मांगंे तो वह अवश्य पूरी होती है। इस बात का उन्होंने दावा भी किया। गौरतलब है कि बीते कुछ माह पहले मंदिर परिसर के एक खेत की खुदाई के दौरान महाविष्णु शालीग्राम और करोटी कोराली शालीग्राम मिले थे, जो इस युग में शायद ही कहीं पाए जाते हों। उनका कहना है कि वे इस मिली महाभागवत गीता के जरिए इस मंदिर के इतिहास को लोगों को समक्ष रखेंगे।










