भारत को दूसरे देशों में ऐसे ‘ब्रांड एंबेसडरों’ की जरूरत है, जो वैश्विक भारत की विश्वसनीय और चमकदार छवि प्रस्तुत कर सकें। हमें ऐसे ‘प्रवक्ताओं’ की जरूरत है, जो विदेशों में स्थानीय राजनीति को प्रभावित कर सकें।
हाल ही में अमेरिका की सिलिकॉन वैली में एक भारतीय थिंकटैंक द्वारा भारतीयों के लिए आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित लोगों में ‘घर वापसी’ को लेकर गजब का उत्साह देखा गया। जब वहां मौजूद लोगों से पूछा गया कि कितने लोग भारत लौटने की योजना बना रहे हैं तो उनमें से 75 फीसदी लोगों ने अपने हाथ ऊपर उठा दिए।
ऐसे में जब प्रधानमंत्री ने अपनी हालिया अमेरिकी यात्रा के दौरान भारतीय अमेरिकी और प्रवासी भारतीयों से भारत लौटने का आह्वान किया तो उससे एक हकीकत ही प्रतिध्वनित हो रही थी। किसी जमाने में पश्चिम जाने के इच्छुक मध्यमवर्गीय भारतीय प्रोफेशनल के लिए अमेरिकी ‘ग्रीन कार्ड’ उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती थी। आज जबकि अपने ही आर्थिक संकट के बोझ तले अमेरिकी सपना तड़क रहा है, भारतीयों को ग्रीन कार्ड से भी अधिक हरियाली भारत लौटने में नजर आ रही है।
लेकिन भारतीयों को अपने घर क्यों नहीं लौटना चाहिए, इसके पीछे कई वाजिब कारण हैं। एक वजह तो यह है कि जैसे-जैसे भारत विश्व मंच पर एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, उसे दूसरे देशों में ऐसे ‘ब्रांड एंबेसडरों’ की सख्त जरूरत है, जो वैश्विक भारत की विश्वसनीय और चमकदार छवि प्रस्तुत कर सकें। भारत को ऐसे ‘प्रवक्ताओं’ की जरूरत है, जो जहां कहीं भी रहें, स्थानीय समुदायों और स्थानीय राजनीति को प्रभावित कर सकें और अपने कौशल के बलबूते विदेशी सरकारों को भारत के पक्ष में अपने फैसलों को आकार देने को राजी कर सकें। भारत को ऐसे ‘वैचारिक कार्यकर्ताओं’ की जरूरत है, जो विदेशों में समाज के सभी वर्गो में अपनी पैठ बनाकर भारत की सकारात्मक छवि पेश कर सकें।
जैसा कि व्हाइट हाउस के बैंक्वेट हॉल में मनमोहन सिंह के सम्मान में आयोजित रात्रिभोज से साबित हुआ, अमेरिका में ऐसे कई भारतीय अमेरिकी हैं, जो ब्रांड इंडिया की छवि को चमकाने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। चाहे राजनीति हो या व्यवसाय अथवा साहित्य, हर क्षेत्र में भारतीयों ने अपनी छाप छोड़ रखी है और इस तरह अमेरिका में भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाने का काम किया है।
भारतीय अमेरिकी उद्यमी और विद्वान विवेक वाधवा ने हाल ही में डच्यूक यूनिवर्सिटी में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, ‘1960 के दशक में जब मैं न्यूयॉर्क सिटी स्थित एक पब्लिक स्कूल में पढ़ने गया तो मुझे भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही थी, लेकिन आज एक पीढ़ी के बाद मेरे बच्चों को भारतीय होने पर गर्व का एहसास होता है। जब अमेरिकी भारतीयों की ओर देखते हैं तो वे सोचते हैं कि भारतीय कितने स्मार्ट हैं, जो हाईटेक सीईओ, डॉक्टर या आईटी पेशेवर हैं।’
अमेरिकी मानसिकता में यह बदलाव कुशल भारतीय पेशेवरों की वजह से आया है। ऐसे पेशेवरों को अमेरिकी समाज में और भी गहरी पैठ बनाने की जरूरत है। दुनिया के अन्य हिस्सों जैसे यूरोप व पूर्वी एशिया के देशों और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी ही क्रांति की दरकार है।










