परदे के पीछे : सिनेमा अपच में हिचकी
सफल फिल्म ‘चीनी कम’ के लिए प्रसिद्ध फिल्मकार आर बाल्की का कमाल यह है कि वह गंभीर विषय भी मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पूरी दुनिया में बमुश्किल 50 बच्चों को प्रोजेरिया का रोग होता है, जिसमें तेरह वर्ष की उम्र का बच्च अस्सी का दिखता है। इस लाइलाज रोग के केंद्रीय विचार के इर्दगिर्द उन्होंने नाटकीय द्वंद्व की मजेदार फिल्म रची है।
फिल्म में अभिषेक बच्चन और विद्या बालन की प्रेम कथा भंग हो जाती है, जब अविवाहित विद्या बच्च नहीं गिरातीं और अभिषेक समझते हें कि वह गिरा चुकी हैं। तेरह वर्ष बाद सफल सांसद अभिषेक सरेआम अपनी भूल स्वीकार करके अपने राजनीतिक भविष्य को खतरे में डालते हैं और मृत्युशैया पर लेटे अपने प्रोजेरिया पीड़ित बेटे के बिस्तर के गिर्द सात फेरे लेते हैं।
यह हास्य फिल्म नहीं है, परंतु इसमें कमाल का ‘विट’ है अर्थात संवाद आपको गुदगुदी करते हैं। हास्य शरीर संचालन से भी उत्पन्न किया जा सकता है, परंतु ‘विट’ केवल संवाद से उत्पन्न होता है और इसमें निहायत ही किफायत से शब्दों का इस्तेमाल होता है। विट में कंजूसी ही दौलत है। मां अपने पुत्र के तेरहवें जन्मदिन पर पिता का नाम और परिचय देती है और कहती है कि वे दोनों अब उनके सफल सांसद के लिए हिचकी के समान हैं और उन्हें लज्जित नहीं करना है।
दरअसल हमारा फॉमरूलाबद्ध सिनेमा अपच का शिकार है और यह फिल्म हिचकी की तरह है, जो फॉमरूले को सरेआम शर्मसार करती है। आर बाल्की असाधारण प्रतिभा के धनी हैं और निर्माता भी अपने साहस के लिए बधाई के पात्र हैं। सिनेमा महंगा माध्यम है, अत: बॉक्स ऑफिस पर सफलता का बहुत अधिक महत्व है, परंतु इस हद के परे भी सिनेमा जाता है। यह फिल्म अमिताभ के अभिनय कौशल को प्रस्तुत करने के लिए बनाई गई है।
फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति अमिताभ बच्चन हैं। वही फिल्म की कमजोरी भी इस मायने में हैं कि उनका पारंपरिक प्रशंसक उन्हें ढूंढ़ता ही रह जाता है और वे अपने गेटअप-मेकअप के पहाड़ों के पीछे छुपे रहते हैं। यहां तक कि भूमिका की खातिर अमिताभ ने अपनी आवाज को भी पूरी तरह से बदल दिया है। प्रोजेरिया पीड़ित तेरह वर्षीय बालक की भूमिका में वह इस तरह से समाहित हो गए हैं कि आपको केवल पात्र ही नजर आता है।
स्वयं को इस तरह अदृश्य करना आसान काम नहीं है। अभिषेक और विद्या बालन ने भी बढ़िया काम किया है, परंतु विद्या की मां की भूमिका निभाने वाली कलाकार का अभिनय वाकई कमाल है। स्वानंद किरकिरे ने बहुत ही अच्छे गीत लिखे है और वर्षो बाद इलियाराजा मुंबई की फिल्म में लौटे हैं। यह दिल को छूने वाली फिल्म है, परंतु हाल के वर्षो में मनोरंजन की परिभाषा बदल चुकी है। इस तरह की फिल्म का मूल्यांकन बॉक्स ऑफिस के मानदंड पर नहीं किया जा सकता।










