Thursday, Dec 17th, 2009, 1:02 am [IST]  
danik bhaskarसामंजस्य
प्रेम कुमार बूलिया

‘सुबह का अखबार रात को आई बारिश और तेज़ अंधड़ की खबरों से भरा पड़ा था। कहीं बिजली के खम्बे गिरे, कहीं पेड़ उखड़ गए। कहीं-कहीं मोबाइल के टॉवर भी धराशायी हो गए।



‘ग़ज़ब है यार, इतने पेड़ गिरे कि सभी रास्ते रुक गए।’ ‘हां यार, फिर भी ये आंधियां आजकल पहले जैसी नहीं है। पहले कैसी, काली, पीली, लाल आंधियां आती थी। चार-चार दिनों तक हाथ को हाथ नहीं सूझता था।’



‘तो क्या आजकल की आंधियां •यादा ताकतवर हैं?’
‘अरे नहीं, आजकल के पेड़ कमज़ोर हैं।’
‘वो कैसे?’



‘आजकल विदेशी बीजों से जो उगाए जाते हैं। जो यहां के बीज नहीं, भला उनका यहां की ज़मीन और मिट्टी से कैसा रिश्ता? न ज़मीन की पेड़ से पहचान और न पेड़ का ज़मीन-मिट्टी से कोई रिश्ता।’
‘बात तो तुम सही कह रहे हो पर...’



‘अरे, पर क्या? कोई अपने घर और अपनी मिट्टी के बिना मज़बूत कैसे रह सकता है? वे अपनी जड़ें यहां जमा ही नहीं पाते हंै और उखड़ जाते हैं।’
‘ठीक कहा यार, देखो न आजकल के बच्चे तो पैदा होते ही विदेश का मुंह ताकने लगते हैं।’

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