बिल्ली के गल टल्ली
पिछले अंक में आपने पढ़ा- लालू चूज़ा अपने परिवार के साथ मट्टू के घर के आंगने में रहता है। उसका एक पैर जन्म के समय ही थोड़ा टेढ़ा हो गया था। मट्टू उसका बहुत अच्छा दोस्त है। वह हर कदम पर लालू की मदद करता है। लेकिन अभी-अभी लालू के परिवार के साथ एक हादसा हुआ है। लालू के भाई कालू को बिल्ली उठाकर ले गई। अब आगे पढ़ें..
नतो हवेली में बांधे डब्बू को पता चला.. न कालू के बाप को और न ही उसके भाई-बहनों को, मगर मां मुर्गी ने सारा हादसा अपनी आंखों से देखा था। इससे पहले कि वह अपने प्यारे कालू को बचाने के लिए बिल्ली पर झपटती या कुछ और कर पाती, भूतैली बिल्ली आंखों से ओझल हो चुकी थी। मां मुर्गी की टांगों में से जैसे जान निकल चुकी थी। कांपती हुई टांगों पर खड़ा होना भी बड़ा मुश्किल लग रहा था। आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था.. और कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था।
चोंच में लम्बा सा केंचुआ लिए मुर्गा अपने चूज़ों के पास आ रुका और इधर-उधर झांकने लगा मानो किसी को खोज कर रहा हो..। ‘क्या खोजता है?’ मुर्गी मां ने डबडबाई आंखें लिए, भर्राई आवाज़ में मुर्गे से पूछा, जबकि उसे मालूम था कि वह कालू के लिए केंचुआ पकड़ कर लाया है।
‘देखती नहीं यह केंचुआ.. कहां है मेरा लाड़ला कालू..। दो दिन से केंचुए की मांग कर रहा था.. अब कहां चला गया? दिखाई नहीं दे रहा..।’ इधर-उधर नज़रें दौड़ाते मुर्गे ने पूछा। ‘बिल्ली ले गई उसे.. अब नहीं लौटने वाला तेरा कालू..।’ मां मुर्गी ने आंखों से टप-टप आंसू बहाते हुए कहा। बात सुन जैसे मुर्गे की सांस भी रुक गई। चोंच में पकड़ा केंचुआ छूट कर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा। कालू के बिछोड़े से बेखबर दूसरे चूज़े केंचुए के ऊपर टूट पड़े।
मुट्ठी में दाने भर, मट्टू भाई लालू को अंदर ले आया। दाने देख लालू मट्टू के और समीप आ गया। कुर्सी में बैठा मट्टू लालू को दाने डालता टीवी देखने लगा। तेज़-तेज़ सांस लेती दादी मां को फिर से खांसी शुरू हो गई। मट्टू कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। दादी मां के पास जाकर वह चारपाई पर बैठ गया और लगा दादी मां का सिर दबाने। पीछे-पीछे लालू भी टीवी देखना छोड़ टुप..टुप करता मां की चारपाई के पास आ खड़ा हुआ। फिर क्या किया, उसने छोटी-सी उड़ान भरी और दादी के पैरों के पास चारपाई पर जा खड़ा हुआ। कुछ देर वह मट्टू भाई को दादी मां का सिर दबाते देखता रहा। पता नहीं, उसके मन में या आया, वह दादी मां के पांवों पर चढ़ कर लगा चीं..कू..कु..चीं.. करने, मानो कह रहा हो- ‘मैं भी मां के पांव दबा रहा हूं। देखना! अब दादी मां कितनी जल्दी ठीक होती हैं..।’
अचानक मट्टू को याद आया कि पहले भी मां की हालत खराब हो जाती थी, तब उसकी अम्मा दादी मां को एक गुलाबी रंग की गोली खिलाती थीं। फिर क्या हुआ.. मट्टू ने साथ वाली टेबल पर पड़ी कटोरी में से एक गुलाबी रंग की गोली उठा ली। फिर पानी वाला गिलास पकड़ उसने पानी के साथ दादी मां को गोली खिला दी। दादी मां की टांगों पर खड़ा लालू सारा कुछ बड़े ध्यान से देख रहा था।
मां को दवाई की गोली खिलाकर मट्टू भाई फिर टीवी देखने कुर्सी में जा बैठा। लालू ने भी चारपाई से नीचे उतरने के लिए अपने पंख फड़फड़ाए और देखते-देखते वह मट्टू भाई के पास जाकर टीवी देखने लग गया। गोली ने बीमार दादी मां पर जादू-सा असर किया। तड़पती और पीड़ा से छटपटाती दादी मां को जैसे सुकून मिल गया हो। उनकी खांसी थम गई। देखते-देखते वे आंखें मूंद कर आराम से सो गईं। बाहर, सूर्य डूबने जा रहा था। मट्टू के माता-पिता अभी घर नहीं लौटे थे। अंधेरा होने जा रहा था।
मुर्गी ने कुक.कुक.. करके चूज़ों को अपने पास बुलाया। सभी चूज़ों को ले वह जामुन के पेड़ की तरफ चल दी। जामुन के तने से होती हुई वह अपने छज्जे के ऊपर जा बैठी।
मुर्गी और उसके सभी चूज़े अपने छज्जे पर जा बैठे थे। एक लालू ही था, जो मट्टू के साथ उसके कमरे में बैठा टीवी देख रहा था। हवेली के घूमते मट्टू भाई ने लालू को देखा और उसकी तरफ हो लिया। प्यार से पुचकार कर उसे हाथों में पकड़ा और उसे छज्जे पर बैठा कर अपने घर चला गया।
नीचे खड़े मुर्गे ने उधर-उधर नज़रें दौड़ाई। नीचे कोई चूज़ा बाकी नहीं था। अपने मन की तसल्ली कर उसने भी उड़ान भरी और चुपचाप अपने छज्जे पर जा बैठा। ‘मां! मां! लोरी सुना..नींद नहीं आ रही..’ चांदनी रात की चुप्पी तोड़ते लालू ने मां से कहा। जवाब में मां ने कोई हूं..हां.. न कही। ‘मैं गीत सुनूंगा..’ अब कि चिट्टू चूज़ा बोला।
‘प्यारे बच्चों! कल सुन लेना कथा-कहानी..आज आराम से सो जाओ..’ बाप मुर्गे ने मीठा-सा दबका मारते चूज़ों को कहा। ‘मां! मां! लोरी नहीं सुनाना चाहती तो कहानी सुना दो..’ मां मुर्गी के पास सरकते हुए लालू ने कहा। ‘प्यारे बच्चों! आज नहीं, फिर कभी सुनाऊंगी कहानी..’ मां मुर्गी बोली और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। ‘मां! मां! काहे को रोती है? यदि कोई तकलीफ है, तो नीचे से गोली लेकर आऊं?’ लालू ने मां से पूछा। ‘लालू के बच्चे! तेरे भाई कालू के बिछोड़े से दुखी है तेरी मां..’ साथ बैठे बाप मुर्गे ने थोड़े गुस्से से कहा। ‘क्या हुआ भाई कालू को..?’ ‘कैसे बिछड़ा कालू..?’ ‘हां सच्च, कालू कहां गया? दिखाई नहीं देता..’ दूसरे चूज़े बारी-बारी पूछने लगे।
‘बिल्ली ले गई तुम्हारे कालू को..’ सिसकती हुई मुर्गी बोली। ‘अभी जाता हूं और कालू भईया को लेकर आता हूं..उधर कहीं खेलता होगा बिल्ली मौसी के साथ..’ लालू ने मानो उड़ान भरने के लिए पंख फड़फड़ाते हुए कहा। न बच्चे न.. तुम मत जाना कहीं.. तेरे से तो भागा भी नहीं जाएगा.. अब तक तो खा-चटम कर गई होगी काली नीयत वाली बिल्ली, हमारे कालू को..कालू गया सो गया.. तू गया तो तुझे भी खा जाएगी वह..’ लालू को छाती से लगाती मां मुर्गी बोली।
‘बिल्ली मौसी तो चूहे खाती है..’ साथ बैठा चिट्टू चूज़ा बोला। ‘चूहे ही नहीं, चिड़ियां तथा कबूतरों को भी हज़म कर जाती है बिल्ली.. न किसी ने उसके गले में घंटी बांधी आज तक..न हमारी जान बची..’ उदासी भरे गले से बाप-मुर्गे ने कहा। ‘पापा! पापा! यदि बिल्ली मौसी के गले से घंटी बांधकर हमारी जान बचती है, तो फिकर मत करो, मैं बांधूगा बिल्ली के गले में घंटी..’ लालू ने गर्दन अकड़ाते हुए कहा। ‘प्यारे बच्चे! कुछ कहना बहुत आसान होता है लेकिन करना बहुत कठिन होता है..। बेचारे चूहों की सुनो.. सदियों से बिल्ली के गले में घंटी बांधने की कोशिशें करते चले आ रहे हैं, मगर आज तक सफल नहीं हुए.. हमें भी नई बिपता मोल लेने की कोई ज़रूरत नहीं.. बस! मिल-जुलकर बिल्ली का मुकाबला करना होगा, नहीं तो वह एक-एक करके सभी को खा जाएगी..’ उबासी लेकर लालू को अपने पंखों के नीचे छुपाती मां मुर्गी बोली।
लालू ने कोई जवाब नहीं दिया। मां के पंखों की गर्माहट में वह सो गया था। रोज़ की तरह मुर्गे की बांग सुन, कृष्णा की बीवी जाग गई। धूप-बत्ती जला, वह घर के काम करने लग पड़ी। मुर्गे की दूसरी बांग सुन मुर्गी की आंख खुल गई। साथ-साथ सोए चूज़े भी जागकर, सूर्य की लालिमा देखने लगे। जैसे ही मुर्गे ने पंख फड़फड़ाकर छज्जे से नीचे उड़ान भरी, पीछे-पीछे मां मुर्गी और चूज़े भी नीचे आ गए।
ऊपर खड़ा लालू उड़ान भरकर नीचे जा चुके चूज़ों को बड़े ध्यान से देख रहा था।
उसे नीचे उतारने के लिए मट्टू अभी जागा नहीं था। उसने क्या किया, पूरे ज़ोर से पंख फड़फड़ाए और अपने भाई-बहनों की तरह नीचे की तरफ उड़ारी लगा दी। ज़मीन पर अपना संतुलन बनाने के लिए वह थोड़ा भागा और फिर थम गया। इधर-उधर झांकता हुआ मन ही मन बुदबुदाया- वाह, कितना मज़ा है उड़ान में। सूर्य की लौ चारों तरफ फैल रही थी। गुहारे के पास रुड़ी कुरेदते चूज़ों ने जैसे ही आओ-आओ की पुकार सुनी, वह सिर पर पांव रखकर भागे अपने मालिकों के घर की तरफ। सबसे पीछे रहने वाला लालू अब सबसे आगे था।
चिट्टू पीछे और चितरा उसके पीछे। सबके पीछे मां मुर्गी और बाप मुर्गा इधर-उधर झांकते बड़ी सावधानी से चले आ रहे थे। दरवाज़े में मट्टू दाने की कटोरी लिए खड़ा था। मुट्ठी-भर दाने चूज़ों को डाले और अपने लालू को हथेली पर दाने खिला, वह डब्बू को संगली से बांधने चला गया। डबू रात भर खुला रहता था और हवेली की रक्षा करता था। डब्बू की कटोरी में दूध डाल, बचा हुआ दूध मट्टू भाई ने बिल्ली की कटोरी में उड़ेल दिया। वह बिल्ली जो कभी-कभी हवेली में आती थी, मगर रहती पता नहीं कहां थी। दाने समेटकर मुर्गा-मुर्गी और उनके चूज़े हवेली के गेट की तरफ चल दिए। लंगड़ाता हुआ लालू घर की तरफ वापस लौट आया। मानो कोई ज़रूरी काम याद आ गया हो। वह बिल्ली की दूध वाली कटोरी के पास खड़ा-खड़ा कुछ सोचने लगा। क्या चल रहा है लालू के मन में? कालू का क्या हुआ? पढ़िए अगले अंक में।










