भोपाल. मध्यप्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के काम के सोशल ऑडिट में ग्राम सभाओं की मदद के लिए स्वयंसेवी संगठनों की सहायता लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। वास्तविकता के बजाय कागजी काम होने के बढ़ते मामलों को देखते हुए ऐसा किया गया है। अभी इस काम की वैकल्पिक व्यवस्था तय नहीं हुई है।
दो साल पहले जिला स्तर पर विज्ञापन निकालकर सामाजिक अंकेक्षण का काम एनजीओ के हवाले किया गया था, लेकिन कई स्वयंसेवी संगठनों ने पंचायतों पर दबाव बनाकर इसे कमाई का जरिया बना लिया था। कई जगह से फर्जी रिपोर्ट देने जैसे मामले भी सामने आए।
विधानसभा में भी इस तरह के मामले विधायकों ने उठाए थे। नरेगा में सोशल ऑडिट को महत्व दिया गया है। साल में दो बार सामाजिक अंकेक्षण जरूरी है। इसलिए अब राज्य सरकार कोई वैकल्पिक व्यवस्था तय करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए 10 और 11 जनवरी को प्रशासन अकादमी में कार्यशाला आयोजित की गई है। सामाजिक क्षेत्र के कार्यो के अनुभवी श्याम बोहरे को इसकी जिम्मेदारी दी गई है।
गड़बड़ियों की भरमार, पर शिकायतें महज 10 हजार
केंद्र सरकार ने भी 26 जून 2009 को सामाजिक अंकेक्षण के लिए आउटसोर्सिग प्रतिबंधितकरने का निर्देश दिया था। इस पर छह महीने बाद मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद ने सभी जिला कलेक्टरों और जिला कार्यक्रम समन्वयकों को आदेश दिया है कि जिन संस्थाओं को काम दिया गया है, उसका अब न तो नवीनीकरण किया जाए और न ही नई निविदा बुलाई जाए।
एनजीओ एक पंचायत का साल में दो बार सामाजिक अंकेक्षण करते थे। इसके लिए एनजीओ 500 से लेकर दो हजार रुपए तक में ठेका ले लेते थे। एक एनजीओ एक जिले की सभी पंचायतों का ठेका लेता था। नरेगा में गड़बड़ियों की भरमार होने के बावजूद प्रदेश में सोशल ऑडिट में सिर्फ 10 हजार शिकायतें ही दर्ज बताई गई थीं। इनमंे से ढाई हजार मामलों में दस्तावेजी सबूत पेश किए गए, लेकिन केवल 170 मामलों में ही कार्रवाई हुई, जबकि अन्य राज्यों में ज्यादा मामलों मंे कार्रवाई हुई है।
नई व्यवस्था होगी
स्वयंसेवी संस्थाओं से सामाजिक अंकेक्षण कराए जाने के अच्छे नतीजे नहीं मिले हैं, अब इसके स्थान पर कारगर व्यवस्था तैयार करने पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। - गोपाल भार्गव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री










