Sunday, Jan 3rd, 2010, 12:15 am [IST]  
danik bhaskarलोभ अच्छा है क्योंकि इसी से यह संसार है
वेंकटेशन वेंबू

यदि हम यह जानना चाहते हैं कि दुनिया के खत्म होने के बाद जिंदगी कैसी होगी तो गुजरा हुआ साल हमें उसकी एक झलक दिखला सकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि इस साल नैतिकता का जो लंबा खेल या प्रहसन खेला गया, उसमें सच्चचरित्रों की टोली ने लोभी बैंकरों की चर्बी कम करने की कोशिश की और राजनीतिक सुधारों के प्रयासों के तहत लोभी उपभोक्ताओं को भी समय-समय पर नसीहत देती रही।



एक श्वेत-श्याम समानांतर दुनिया में यह देखना आसान है कि आखिर क्यों आर्थिक जगत वैश्विक मंदी और संकट में फंस गया जिससे वह अब भी पूरी तरह से उभर नहीं पाया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि माना गया कि मौजूदा आर्थिक व्यवस्था के मुख्य सिद्धांतों को लालच हजम कर गया। हम अपने बारे में कुछ अच्छा महसूस कर सकें, इसके लिए हमें कुछ त्याग करने होंगे। कुछ को कहीं न कहीं तो भुगतना होगा ही। ब्रिटेन और अन्य कई जगहों पर इस रस्म को निभाने की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है, जहां बैंकरों के बोनस पर ‘सुपरटैक्स’ लगाने की घोषणा की गई है। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि जिस उद्योग को इतने बड़े पैमाने पर राहत दी जा रही है, उसके कर्मचारियों को इतना बड़ा भुगतान पाप के समान होगा।



यदि दुनिया की अर्थव्यवस्था के इंजन को फिर से चालू करना है तो इसके लिए न केवल मानवीय होशियारी की जरूरत होगी, बल्कि मानवीय ‘लोभ’ की समुचित खुराक की भी। आर्थिक ढांचे की बुनियाद हम सभी के योगदान (और साथ ही लोभी उपभोक्ताओं) पर टिकी होती है। सच तो यह है कि दुनिया को आगे बढ़ाने वाले अधिकांश आविष्कारों के लिए बड़ी तादाद में ऐसे लोभी उपभोक्ताओं की जरूरत होती है जो भारी मात्रा में पैसा खर्च करते हैं, यहां तक कि कुछ मामलों में ऐसी चीजों के लिए भी जिनकी उन्हें वास्तव में जरूरत नहीं है। इसके बगैर कंपनियों को इतना पैसा नहीं मिल पाएगा कि वे विज्ञान और प्रौद्योगिकी को साधकर बाजार में उत्पाद पेश कर सकें। लेकिन पिछले साल दुनियाभर में उपभोक्ता खर्च में भारी कमी आई जिसके फलस्वरूप कई पेटेंटों को नाटकीय ढंग से मुंह की खानी पड़ी।



अच्छी चीज यह है कि हममें से अधिकांश लोग लोभी हैं और अच्छी जिंदगी जीने के आकांक्षी हैं। इधर भारत में, हम इस अवधारणा को अपनाने की दिशा मंे आगे बढ़ रहे हैं कि व्यक्तिगत और कंपनियों के स्तर पर भी अच्छा करना जायज आकांक्षा है।



एक समय पूर्व प्रधानमंत्री ने जेआरडी टाटा से कहा था, ‘लाभ - उस गंदे जगत का उल्लेख भी मत करो।’ नेहरू ने टाटा से यह बात उस समय कही थी, जब टाटा ने उनसे कहा था कि यह अच्छा होगा कि सरकारी स्वामित्व वाले उद्यम राजकोष पर बोझ बनना छोड़ दें। लेकिन आज हम इस ‘गंदे जगत’ के बारे में बात करके खुश हैं।



गॉर्डन गेक्को ने कभी वॉल स्ट्रीट में लिखा था, ‘लोभ अच्छा होता है।’ शायद किसी दिन ऐसा भी हो सकता है कि हम एक और ‘गंदे जगत’ यानी ‘लोभ अच्छा होता है’ की अवधारणा को गले लगा लें।



लेखक डीएनए के विदेश संवाददाता हैं।

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