मुहरर्म पर कराची में हर साल निकलने वाला मातमी जुलूस निकल रहा था। शाम 4 बजे तक सब तरफ ख़ैरियत थी, लेकिन जुलूस जब पुराने कराची के इलाक़े में दाख़िल हुआ, उस व़क्त एक ताक़तवर बम धमाका हुआ, जिसमें 48 लोग मारे गए, सैकड़ों ज़ख़्मी हुए। अभी बम धमाके की आवाज़ और तबाही से लोग संभले नहीं थे कि उसी व़क्त कुछ लोगों ने, जो अपने चेहरे ढंके हुए थे, आसपास के बाज़ारों में आग लगा दी। घंटे भर के अंदर पुराने कराची की तीन हÊार से Êयादा दुकानें और 1100 से Êयादा गोदाम जल गए, साथ में कई बैंक भी जले।
अपनी जलती दुकानें देखकर दुकानदार फूट-फूटकर रोते रहे। आग की इत्तिला मिलते ही दो दुकानदारों को दिल का दौरा पड़ गया। आत्मघाती धमाके के फ़ौरन बाद आग लगाने वालों ने सिक्युरिटी पर हमले किए। पूरे पाकिस्तान को प्लास्टिक, साइकिलें, काग़झ, कपड़े, दवाइयां, खिलौने, बिजली का सामान उपलब्ध कराने वाले एनए जिन्ना मार्केट समेत कई बाज़ारों में हज़ारों दुकानें जला दी गईं, जिससे हज़ारों दुकानदार भिखारी और उनके यहां काम करने वाले बेराÊागार हो गए।
करीब 35-40 अरब रुपए का यह नुक़सान बरसों में पूरा नहीं हो सकेगा। असल में धमाका होते ही फ़सादियों के गिरोह ने अचानक हंगामा शुरू कर दिया और लोगों, पुलिस बल पर फायरिंग की। फायरब्रिगेड की गाड़ियों को क़रीब न आने दिया और वहां खड़ी सैकड़ों गाड़ियां जलाना शुरू कर दिया। इन लोगों ने एंबुलेंस, सहाफ़ियों (पत्रकारों) और घायलों की सहायताकरने वालों को भी काम करने से रोकने की कोशिश की। वे लोग, जिन्होंने अपनी आंखों से सब कुछ होते देखा है, वे बताते हैं कि पहले दुकानों के ताले तोड़े गए और फिर कोई ख़तरनाक कैमिकल दुकानों में फेंका गया, जिससे इनमें मौजूद सामान सूखी लकड़ी की तरह जलने लगा।
आग लगाने वालों ने अंग्रेजी राज के ज़माने की वे इमारतें, जो कराची की पहचान थीं और हैरिटेज बिल्डिंग में गिनी जाती थीं, उन्हें भी नहीं छोड़ा। उनमें से एक कराची म्यूनिसिपल कॉपरेरेशन की पुरानी बिल्डिंग थी, जिसके बारे में हमारी मशहूर आर्किटेक्ट यास्मीन लारी का कहना है कि इसमें कराची के वे ऩक्शे भी रखे हुए हैं, जो 1874 में ब्रिटिश सर्वेयर ने तैयार किए थे। यास्मीन लारी ने बताया कि बंदर रोड पर, जो अब एमए जिन्ना रोड कहलाता है, दो मील की लंबाई में दोनों तरफ़ 60 से ज्यादा वे बिल्डिगें हैं, जो ब्रिटिश राज के ज़माने में अंग्रेÊाों, पारसियों और हिंदुओं ने बहुत मोहब्बत और मेहनत से बनाई थीं।
इनमें थियोसॉफिकल हॉल, मामा पारसी स्कूल, एनजेवी स्कूल, रेडियो पाकिस्तान बिल्डिंग शामिल हैं। शहर वाले जहां इंसानी जानों और कारोबारी तबाही पर रो रहे हैं, वहीं इन्हें इसका भी सदमा है कि इनके शहर की पहचान कई इमारतें आग का निवाला बन गईं। इसके साथ ही शहरवालों को इसकी खुशी भी है कि एनजेवी स्कूल, रेडियो पाकिस्तान, थियोसाफिकल हॉल महफूज़ रहे। लोगों ने इस बात पर भी शुक्रिया अदा किया कि स्वामी नारायण मंदिर को भी इस बम धमाके में और आग से कोई नुक़सान नहीं पहुंचा। बहरहाल, अभी तक जो अंदाÊा लगाया गया है, उसके हिसाब से क़रीब 25 हÊार लोग बेकार हो गए हैं।
कराची एक ऐसा शहर है, जहां हर मÊाहब, फ़िरक़े और ज़बान के लोग रहते हैं और यह बात सभी जानते हैं कि कराची को तबाह और बरबाद करने वाले उनके बद्तरीन (सबसे बुरे) दुश्मन हैं। यही वजह है कि सब्र से काम ले रहे हैं और एक-दूसरे के दिलों को रफ़ू करने की कोशिश कर रहे हैं। दिलों को रफ़ू करने की बात पर याद आया कि क्या पाकिस्तान और क्या हिंदुस्तान, हमारे हर शहर में रफ़ू करने वाले पाए जाते हैं। ये वो लोग हैं, जो फटे-पुराने या छेद वाले कपड़ों को सुई-धागे से इस तरह से ठीक करते हैं कि देखने वाला यह पहचान ही न सके कि यह कपड़ा कभी फटा था। हिंदुस्तान में किसी ज़माने में बड़े-बड़े रफ़ूगर पाए जाते थे और उनके बारे में कई कहानियां भी सुनी हैं। पाकिस्तान में भी ड्राइक्लीनर और लॉन्ड्री शॉप के बाहर यह साइन बोर्ड लगा होता है कि यहां फटे हुए कपड़े रफ़ू किए जाते हैं।
इस व़क्त सबसे अच्छे रफ़ूगर लाहौर शहर के पुराने मोहल्लों ग्वालमंडी, लक्ष्मी चौक, गुल बर्क, अनारकली, मालरोड और समनाबाद में पाए जाते हैं। ग्वालमंडी की एक दुकान में तीन भाई काम करते हैं और तीनों रफ़ूगर हंै। कपड़ों को रफ़ू करना उनका ख़ानदानी काम है। पाकिस्तान बनने से पहले उन लोगों के वालिद और दादा कश्मीर में कपड़े रफ़ू करते थे। कश्मीर से वे अमृतसर चले गए और जब बंटवारा हुआ, तो पाकिस्तान आ गए और यहां आने के बाद भी वे यही काम करने लगे। इन लोगों का कहना है कि कपड़ों को रफ़ू करना असल कश्मीरियों का काम है।
कश्मीरियों को इस काम में महारत हासिल है। पाकिस्तान बनने के बाद हिंदुस्तान से आने वाले रफ़ूगरों ने पाकिस्तान और ख़ासतौर से लाहौर में रफ़ूमरकज़ (रफ़ू सेंटर) बना लिए। इस तरह इस काम ने एक कारोबार की शक्ल अख़्ितयार कर ली। पुराने लाहौर में आज भी रफ़ूगरों की दुकानें उन्हीं जगहों पर क़ायम हैं, जहां आज से 60 साल पहले बनी थीं, लेकिन कुछ जगह पर ड्राइक्लीनर की दुकानों पर बैठे रफ़ूगर Êयादा मशहूर हैं। अब्दुल हमीद बट लाहौर के एक मशहूर रफ़ूगर हैं।
उनकी इसी मक़बूलियत (प्रसिद्धि) की वज़ह से एक गल्र्स कॉलेज ने उन्हें लड़कियों को कपड़ा रफ़ू करना सिखाने के लिए अच्छी तऩख्वाह पर उस्ताद रखा था। बट साहब के पास अमीर और आला अफ़सर, फ़ौज के कर्नल-जनरल भी पुराने स्वेटर और कोट रफ़ू कराते हैं। रफू करने वाले तीन औजार का इस्तेमाल करते हैं सुई, धागा और कैंची। रफ़ू करने के लिए रफ़ूगर चायना की 9 और 11 नंबर सुइयां इस्तेमाल करते हैं। रफ़ूगर दुकानों के अंदर बैठने की बजाय बाहर बैठकर काम करते हैं।
कपड़ों को Êयादा अच्छे से रफ़ू करने के लिए उनकी कोशिश होती है कि उस कपड़े के धागे से ही रफ़ू करें, जो सिलाई के व़क्त अंदर की तरफ़ छोड़े कपड़े में मिल जाता है। यह लिखते हुए मुझे ़ख्याल आ रहा है कि कराची में विभिन्न वर्गो के दिलों को रफ़ू करने की Êारूरत है। हमें यह भी समझना चाहिए कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान की दोस्ती के जिस दुशाले को दीमक लग गई है, उसे रफ़ू करने वाले सामने आएं, ताकि तनाव की वो फ़िजा ख़त्म हो सके, जिसने दोनों तरफ़ के लोगों को परेशान कर दिया है।










