Sunday, Jan 24th, 2010, 3:52 am [IST]  
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danik bhaskarमूवी देखेंगे, मस्ती करेंगे और क्या..
भास्‍कर न्‍यूज

जयपुर। बंक मारकर मूवी जाने वाले स्टूडेंट्स को मॉर्निग शो ने और उकसाया है, टिकट के लिए पैसे भी कम जुगाड़ने पड़ते हैं, समय भी माकूल, सिनेमाघरों को केवल कमाई से मतलब, यह जानते हुए भी कि स्टूडेंट बंक मारकर आया है, फिर भी टिकट दे देते हैं।



समय सुबह 8.45 बजे। तारीख 22 जनवरी, शुक्रवार। स्थान वैभव आइनॉक्स। शहर में नया आया कोई देखता तो यही सोचता कि गलती से किसी स्कूल पहुंच गया। मगर एक स्कूल की ड्रेस तो एक ही जैसी होती है, पर यहां तो इतने तरह की स्कूल यूनिफार्म में स्टूडेंट दिखाई दे रहे थे, जैसे कई स्कूल के बच्चों को किसी मेले में भाग लेने के लिए लाया गया हो।



अनजाना भले ही कुछ सोचता मगर हमें पता था कि माजरा क्या है, पिछले कई शुक्रवार को डीबी स्टार टीम ने शहर के आइनॉक्स और बिग सिनेमाज के प्रमुख सिनेमाहॉलों का जायजा लिया और उसे कमोबेश यही नजारा हर जगह देखने को मिला। स्टूडेंट्स की भीड़ कितनी ज्यादा है, यह मूवी की स्टार वैल्यू पर निर्भर है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस भीड़ में अब गर्ल स्टूडेंट्स भी काफी नजर आने लगी हंै। किसी स्टूडेन्ट का स्कूल बंक कर फिल्म देखना न कोई नई बात है और न ही कोई बहुत बड़ी समस्या, मगर यह आदत बन जाए तो किसी भी स्टूडेंट के कॅरियर के लिए घातक हो सकती है।



शहर के कुछ सिनेमाहॉल्स ने सुबह 9.15 बजे से शो शुरू किए हैं, जिनके टिकट दर अन्य शो से काफी कम हैं। बंक मारकर मूवी देखने वाले स्टूडेंट्स को इन मार्निग शो ने अपनी ओर काफी आकर्षित किया है। इस तथ्य को नजर में रखकर डीबी स्टार काफी दिनों से इसकी जांच-पड़ताल कर रहा था। टीम ने ऐसे स्टूडेंट्स पर काफी बारीकी से नजर डाला और उनके व्यवहार का अध्ययन शहर के मनोचिकित्सकों, टीचरों, अभिभावकों की मदद से किया। हम यहां ऐसे स्टूडेंट्स, उनके अभिभावक, स्कूलों और टीचरों का उल्लेख जानबूझ कर नहीं कर रहे हैं।



डीबी स्टार टीम ने अलग-अलग सिनेमाहॉलों में ऐसे स्टूडेंट्स से भी बातचीत की। मूवी देखने आए स्टूडेंट्स में से कुछ ही स्कूल लौटते हैं, वे भी कोई झूठी कहानी गढ़कर स्कूल प्रबंधन से क्लास में बैठने की अनुमति लेते हैं। मूवी के लिए टिकट का पैसा जुटाने के भी स्टूडेंट्स के अलग-अलग फंडे हैं। इसमें ज्यादातर तरीके नाजायज हैं।



इस जांच-पड़ताल के दौरान स्टूडेंट्स का एक ग्रुप ऐसा भी मिला जो, पार्किग वालें की मिलीभगत से स्कूल की पार्किग में खड़ी मोटरसाइकिलों से पेट्रोल चुरा, उसे सस्ते में बेचकर टिकट के लिए पैसे जुटाता है। इस जांच-पड़ताल यह तथ्य भी उभर कर सामने आया कि बंक मारकर मूवी देखने पहुंचे स्टूडेंट्स का सामूहिक व्यवहार भी उनके व्यक्तिगत व्यवहार से काफी भिन्न हो जाता है। वे ऐसा व्यवहार करते नजर आ सकते है, जैसा उनकी आदत में कभी शुमार न रहा हो।



यकीन नहीं आता तो किसी दिन शुक्रवार को मार्निग शो में जाकर देख लीजिए खुद नजर आ जाएगा। रोमांटिक दृश्यों के आगे बढ़ने के साथ-साथ आपका बच्च कैसे किशोर से वयस्क होता चला जाता है। कई स्टूडेंट्स की मूवी के दृश्यों पर टिप्पणी तो किसी को भी शर्म से पानी-पानी कर सकती है। बच्च स्कूल गया कि नहीं, उसने क्लासेज अटेंड की कि नहीं, क्या पढ़ा इस तरफ से गाफिल अभिभावकों के वार्ड्स, फ्राइडे फीवर के ज्यादा शिकार मिले।



ऐसे स्टूडेंट्स के पैरेंट्स और स्कूल प्रबंधन के बीच संवाद भी बस टीचर-पैरेन्टेस मीटिंग तक सिमटा मिला। नतीजा इस संवादहीनता का फायदा बच्च उठा रहा है। यही बात स्कूल प्रबंधन पर भी लागू होती है, जहां प्रबंधन, स्टूडेंट्स की अटेंडेंस के प्रति सख्त हैं, उस स्कूल के बच्चे शुक्रवार को सिनेमाहॉल पर कम मिलते हैं। यह टिप्पणी शहर के सभी स्कूलों और सभी स्टूडेंट्स के बारे में नहीं है।



डीबी स्टार का दावा है कि शुक्रवार को अचानक निरीक्षण करा लिया जाए तो ज्यादातर स्कूलों में आठवीं से लेकर 12वीं तक के क्लासेज में अन्य दिनों की अपेक्षा उपस्थिति कम मिलेगी। इसको रोकने के लिए शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन को सामूहिक स्तर पर प्रयास करना होगा। सिनेमाहॉल प्रबंधक भी इसमें सहयोग कर सकते हैं, लेकिन फिलहाल उनका ध्यान केवल कमाई की ओर है।

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