चंडीगढ़. जनरल एसएफ रोड्रिग्स को अभी राजभवन छोड़े हफ्ता भी नहीं हुआ कि सीबीआई ने दो मेगा प्रोजेक्ट्स की जांच शुरू कर दी। वीरवार को सीबीआई की चंडीगढ़ एंटी करप्शन ब्रांच ने थीम कम एम्यूजमेंट पार्क और मल्टीमीडिया कम फिल्म सिटी प्रोजेक्ट में दो प्रीलिम्नरी इन्क्वायरी (पीई) दर्ज की।
सीबीआई का कहना है कि दोनों प्रोजेक्ट्स की अलॉटमेंट में हुई गड़बड़ियों की जांच के अलावा उन पहलुओं की भी जांच की जाएगी जो सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की रिपोर्ट में दर्ज हैं। साल भर पहले इन प्रोजेक्ट्स को जांच के लिए होम मिनिस्ट्री ने सीवीसी को भेजा था जहां से यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। चंडीगढ़ के कुछ संगठनों ने मेगा प्रोजेक्ट्स में धांधली का आरोप लगाते हुए इनकी जांच की मांग की थी। इसके चलते जनरल रोड्रिग्स भी विवादों में आए और उन्हें वापस भेजे जाने की मांग की गई थी।
थीम पार्क
2006 में सारंगपुर में यूनिटेक के साथ मिलकर प्रशासन ने 73.65 एकड़ जमीन पर थीम कम एम्यूजमेंट पार्क प्रोजेक्ट डेवलप करने का फैसला किया। विजिलेंस जांच में यह बात सामने आई है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जरूरी मंजूरी ही नहीं ली गई। जमीन की कीमत बेहद कम आंकी गई और लीज होल्ड रूल्स की भी उल्लंघना की गई।
साठगांठ से तय हुई फिल्म सिटी की रिजर्व प्राइस
सारंगपुर में ही 30 एकड़ जमीन में पाश्र्वनाथ डेवलपर्स के साथ फिल्मसिटी डेवलप करने का करार किया गया। यह प्रोजेक्ट कंपनी को 191 करोड़ रुपये में दिया गया। दो साल तक प्रशासन ने कंपनी को जमीन का कब्जा ही नहीं दिया।
कंपनी आखिरकार प्रोजेक्ट से पीछे हट गई। विजिलेंस जांच में पता चला कि जमीन की रिजर्व प्राइस साठगांठ के चलते तय हुई। बिडिंग प्रक्रिया में धांधली हुई और सरकारी खजाने को नुकसान हुआ। पाश्र्वनाथ डेवलपर्स को यह प्रोजेक्ट 23 अगस्त 2007 में अलॉट किया गया। सारंगपुर में ही 30 एकड़ जमीन 191 करोड़ रुपये में दी गई जबकि इसकी रिजर्व प्राइस 125 करोड़ रुपये थी।
कंपनी ने 47.75 करोड़ रुपये जमा कराए और उसके बाद जमीन के कब्जे का इंतजार शुरू हो गया। पाश्र्वनाथ डेवलपर्स को यह प्रोजेक्ट अलॉट करने पर चंडीगढ़ की ही एक कंपनी ने ऐतराज किया और मामला अदालत तक भी गया। अदालत से क्लीयर होने के बाद कंपनी जमीन मांगती रही और प्रशासन यह बहाना बनाता रहा कि जो जमीन इस प्रोजेक्ट के लिए दी गई है उसमें से पंजाब राज्य बिजली बोर्ड की एक लाइन गुजरती है। इसे हटाने के लिए कहा गया है। तब प्रशासन के अधिकारियों ने यहां तक कह दिया था कि बिजली के खंभे एक कोने में हैं जहां कंपनी को कोई बिल्डिंग खड़ी नहीं करनी है, अगर कंपनी चाहे तो बाकी हिस्से में काम शुरू कर सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
8 अक्टूबर 2008 को कंपनी ने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए और प्रशासन को लिखा कि इतनी लंबी देरी के कारण और बदले हुए हालात में यह प्रोजेक्ट सिरे चढ़ा पाना अब उसके बस की बात नहीं, लिहाजा उसकी रकम लौटा दी जाए।
प्रशासन ने जमीन का कब्जा नहीं दिया और कंपनी की ओर से जमा कराए गए 47 करोड़ रुपये भी जब्त कर लिए। सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की जांच में यह बात सामने आई है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन की रिजर्व प्राइस ठीक से तय नहीं की गई। यानी 30 एकड़ जमीन के लिए 125 करोड़ रुपये काफी कम थे।
पहले से तय था किसे मिलेगा एम्यूजमेंट प्रोजेक्ट!
प्रशासन की फाइलों में थीम पार्क प्रोजेक्ट के जन्म लेने से पहले ही कुछ सीनियर अफसर प्रोजेक्ट के इस हद तक दीवाने थे कि वे दिल्ली में यूनिटेक के चक्कर काटने लगे।कंपनी इन अफसरों को अधूरे प्रोजेक्ट दिखाती रही और अफसर भी लट्टू होते चले गए।
तब कंपनी दो जगह पर एम्यूजमेंट पार्क डेवलप कर रही थी। हालांकि इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे एक अफसर यह दावा करते रहे हैं कि उन्हें सीनियर अफसरों के आदेश पर ही कंपनी के प्रोजेक्ट देखने के लिए दिल्ली भेजा गया था। यह सब उस वक्त हुआ जब यह तक तय नहीं था कि चंडीगढ़ में थीम कम एम्यूजमेंट पार्क बनाया भी जाना है या नहीं।
मजेदार बात देखिए कि हरियाणा लौट चुके एक सीनियर अफसर ने पंजाब राजभवन में एम्यूजमेंट पार्क को लेकर यूनिटेक की प्रेजेंटेशन तक करवा डाली। प्रेजेंटेशन के बाद प्रशासन की फाइलों का मोटापा बढ़ना शुरू हुआ। टेंडर हुए। कई कंपनियों ने आवेदन किया। बड़ी-बड़ी कंपनियां छोटी-मोटी भूलों के चलते रिजेक्ट हो गईं। प्रोजेक्ट यूनिटेक के मुकद्दर में था, सो उसे मिल भी गया।
6 दिसंबर 2006 को यूनिटेक और प्रशासन के बीच हुए करार में तय हुआ कि प्रशासन 73.65 एकड़ जमीन अपने पास रखेगा और कंपनी इस पर प्रोजेक्ट लगाएगी। उसे हर साल 5.5 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस अदा करनी होगी और सालाना रेवेन्यू का 1.1 फीसदी प्रशासन को देना होगा। आरोप यह लगा कि एक और बड़ी कंपनी 12 फीसदी सालाना रेवेन्यू देने के लिए तैयार थी, लेकिन इसे एक रोज पहले ही तकनीकी आधार पर रिजेक्ट कर दिया गया।
लिहाजा इस कंपनी की बिड ही नहीं खोली गई। जब यूनिटेक को यह प्रोजेक्ट दिया गया तब चंडीगढ़ के आसपास जमीन की कीमत आठ से दस करोड़ रुपये एकड़ चल रही थी। मनीमाजरा में उप्पल्स ने हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए करीब पांच एकड़ जमीन 100 करोड़ रुपये में खरीदी थी। यानी 20 करोड़ रुपये एकड़ के हिसाब से।
प्रशासन को गवारा नहीं था लीज पर जमीन देना
एम्यूजमेंट पार्क कमर्शियल प्रोजेक्ट था और इसकी जमीन की कीमत कहीं अधिक बैठती थी। जितने में कंपनी से सालाना लाइसेंस फीस वसूली जा रही थी उससे कहीं ज्यादा आमदनी जमीन की लीज से हो जाती। प्रशासन को जमीन लीज पर देना गवारा नहीं था। वजह बताई गई कि प्रशासन का एम्यूजमेंट पार्क जैसे प्रोजेक्ट में पहले से कोई तजुर्बा नहीं है, लिहाजा कंपनी को जमीन बेची न जाए और प्रशासन इसे अपने पास रखे।
जानकारों का कहना है कि अगर जमीन की सही कीमत आंकी गई होती तो प्रशासन का हिस्सा भी बढ़ता। उसे केवल 1.1 फीसदी सालाना रेवेन्यू पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। खास बात यह है कि कौड़ियों के भाव 73 एकड़ जमीन का बड़ा हिस्सा लेने के बाद कंपनी ने यहां प्रोजेक्ट शुरू करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई। 5.5 करोड़ रुपये की पहली किस्त देने के बाद बाकी रकम जमा नहीं कराई गई।










