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Friday, Feb 26th, 2010, 2:38 pm [IST]  

danik bhaskarइश्क़िया

Rajesh Yadav

रेटिंग : * * *

निर्देशक : अभिषेक चौबे

प्रोडच्यूसर : केतन मारू , रमन मारू और विशाल भारद्वाज

लेखक : विशाल भारद्वाज, सबरीना धवन , अभिषेक चौबे

कलाकार : नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी, विद्या बालन

संगीत : विशाल भारद्वाज

बैनर : शेमारू इंटरटेनमेंट

फिल्म ‘इश्क़िया’, अपनी बोल्डनेस, शानदार पटकथा, विद्या बालन के संजीदा और बिंदास अभिनय और नसीर और अरशद के खिलंदड़ अंदाज से मिलकर बनी फिल्म है। फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे की यह पहली फिल्म है, रियलिस्टिक सिनेमा के दौर में ‘इश्क़िया’जैसी फिल्म के साथ वे बेहतर शुरुआत करते दिखाई दे रहे हैं। ‘इश्क़िया’बॉलीवुड की एक ऐसी गरम हवा है जिसके तपन से सेंसर बोर्ड ने इसे ए सटिफिकेट दिया है, लेकिन यह कुछ गालियों के शोर और कुछ बोल्ड सीन से परे भी बहुत कुछ है, नए अंदाज में। यह फिल्म बॉलीवुड में आ रहे लेखन के नए अंदाज की तरफ भी संके त करती है जो कुछ ज्यादा ही बोल्ड है। लेकिन विद्या और नसीर द्वारा संवाद इतने शानदार अंदाज में बोले गए हैं जो बोल्ड होते हुए भी एक खास प्रभाव छोड़ते है। फिल्म की कहानी में रोमांस, छल, धोखा और और दिल की इच्छाओं का ऐसा खेल है, इन सब से बॉलीवुड की इस नई गरम हवा का निर्माण हुआ है।

फिल्म में कृष्णा (विद्या बालन) एक ऐसी महिला है जिसके दिल में प्यार के जज्बात, बदले की भावना और बेहद शातिराना अंदाज है, जो कुछ रहस्यमय होने के साथ साथ लुभाने वाला भी है। खालूजान नसीरूद्दीन शाह और बब्बन अरशद ऐसे बदमाश है जो मुस्ताक यानी कृष्णा के पति की मदद से यूपी से भागकर नेपाल जाना चाहते है । वे कृष्णा के घर कुछ दिन के लिए रुक जाते है। खालूजान और बब्बन दोनों ही कृष्णा के सौन्दर्य के सम्मोहन में आ जाते है। इसी बात का फायदा उठाते हुए कृ ष् णा अपने एक गुप्त प्लान पर दोनों की मदद लेती है। बब्बन और कृष्णा में इसी बीच शारीरिक संबंध भी बन जाते हैं और इस बात को लेकर दोनों में मतभेद भी हो जाता है क्योंकि खुद खालूजान भी दिल से कृ ष्णा से प्यार करते थे। इसी बीच कहानी बड़ी तेजी से ट्विसट आता है। और बाद में पता चलता है कि कृष्णा अपने पति के धोखे का शिकार हुई थी और वह जिंदा है, जिसकी अपनी एक जातिगत सेना भी है। वह कृष्णा को फिर से मारने का प्रयास करता है लेकिन खालूजान और बब्बन ऐसे समय में कृष्णा की मदद करते है और उसे सही सलामत बचाने में सफल हो जाते हैं।

जहां तक अभिनय की बात है तो नसीर ने अपने अंदाज में उम्दा काम किया है और बब्बन के रोल में अरशद ने खिलंदड़ अंदाज में बेहतर काम किया है। लेकिन विद्या बालन ने जिस अंदाज में में अभिनय किया है वह बेजोड़ है और वास्तव में फिल्म में उनका रोल बेहद दमदार है। परिणीता के और पा के बाद विद्या के लिए यह एक बेहद खास फिल्म है और जिस बिंदास अंदाज से उन्होंने फिल्म में चरित्र को जिया है उसमें एक स्त्री के दिल के जज्बात, उसका रहस्यमय होना और खूबसूरत हुस्न को बेजोड़ संगम नजर आता है। फिल्म में वे जिस कातिलाना और मनमोहक अंदाज में नजर आई है वह बेहद शानदार है। दिल तो बच्चा है, और इब्ने बतूता जैसे खूबसूरत जैसे गीत इस फिल्म की जान हैं।

फोटो फीचर :vidya balan hot kiss सीन

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जहां तक फिल्म के लेखन की बात है तो फिल्म की पटकथा चुस्त है लेकिन कहानी की डिमांड के नाम गालियों का बेखौफ इस्तेमाल जिस तरह से किया गया है, उससे बचा जा सकता था। फिल्मकार अपनी बात को सिनेमाई भाषा में कुछ और भी रूप दे सकते थे। कुछ अनकहीं बातें कभी कभी गालियों के शोर से ज्यादा प्रभाव डालती है लेकिन आजकल के लेखक की देव डी से प्रेरित लगते है। ऐसा लगता है रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर भाषा के नंगेपन पन पर बॉलीवुड के कुछ लेखक उतारु हो गए है। सबरीना,अभिषेक और विशाल ने जहां कुछ बेहतरीन संवाद फिल्म में लिखे हैं वहीं गालियों के शोर ने उनके लेखन पर सवाल ही उठा दिए हैं। संचार की अशाब्दिक भाषा का इस्तेमाल कुछ स्थानों पर निर्देशक ने किया होता तो बात और दमदार बन सकती थी। भाषा के देसीपन की ठसक और मिठास का संगम दिखाना था तो कुछ मूक शब्दों का प्रयोग भी किया जा सकता था। खैर कुछ सीन आपकी आंखो को खटक सकते है, कुछ संवाद आपके कानों को भी न जचें लेकिन हिन्दी सिनेमा में आ रहे नए लेखन के इस बदलाव से आप आंखे नहीं बंद कर सकते। मॉस सिनेमा नहीं एक खास दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई कम बजट की बेहतरीन फिल्म है जिसे सिनेमा की समझ रखने वाले दर्शक बेहतर समझ पाएंगे।

(रेटिंग -  * * * * *  जरुर देखें
            * * * *     देख सकते हैं
            * * *        टाइमपास
            * *           औसत
            *              बेकार)




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विचार:

MANOJ S. RAUTELA

Sunday, 31st Jan 2010, 20:59
जिस अंदाज में और जिस पटकथा आधारित पर फिल्म बनाई गई है उसमे निर्देशक काफी हद तक सफल रहा है लेकिन गालियौं का धुवांधार पर्योग कर फिल्म को एक अलग क्लास भी दे दिया है, फलस्वरूप सेंसर ने 'ए' सर्टिफिकेट भी दे पटका, इस चीज़ से बचा जा सकता था, लेकिन अपराधिक प्रस्थ्भूमि होने के कारण चोली दमन का साथ रहता है इसलिए चल जायेगा. अभिनय की बात करे तो एक बार फिर सर्किट ने अभिनय का कर्रेंट छोड़ा है,अच्छा काम किया है वहीं विद्या वालान ने पहचान लिया है अभिनय की गली कहा से गुजरती है, रही बात नसीर की तो उनके लिए शब्द कम और विशेलेषण ज्यादा है. रिअलिस्तिक सिनेमा के नाम पर भाषा में नंगापन जो आ रहा है वो सोचनीय है.काबिले तारीफ लेकिन सबसे अलग बात गौर करने लायक है कम बजट पर खाश वर्ग के लिए बनाई गई 'इश्कियां' इश्क होने लायक है. मनोजीत सिंह, TV JOURNALIST

ashish shukla

Monday, 1st Feb 2010, 13:18
movie should be show the realistic picture of the society and also a good interesting movie .

sanjay sen sagar

Monday, 1st Feb 2010, 16:28
जिस तरह की फ़िल्में आज बने जा रही है उससे पता चलता है की दर्शकों का स्वाद और पसंद में काफी बदलाब आया,वो खुलेपन और भड़ास को खुले तोर पर स्वीकार करने लगे है,इसी का नतीजा है की आज के निर्माता और निर्देशक इस तरह की फ़िल्में बनाने के लिए उत्साहित रहते है और मेरा मानना है की जब जनता को इस तरह की फ़िल्में पसंद आती है तो इनका निर्माण जरुर होना चाहिए!

pranav saxena

Monday, 1st Feb 2010, 19:15
फिल्म के लेखक निर्देशक सब यथार्थ् वाद के पैरोकार लगते है यथार्थ सब के लिये नही होता , एक बडा तबका फैंट्सी मे जीता है जो फिल्म को हिट या फ्लॉप बनाती है निसन्देह ये फिल्म कुछ लोगों के लिये है सब के लिये नहीं , फिर भी फिल्म शानदार है इस मे कोइ शक नही है । प्रणव सक्सेना

sudhakar singh

Wednesday, 3rd Feb 2010, 16:30
this flim is best

apne vichaar
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