Saturday, Jan 30th, 2010, 3:48 am [IST]  
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danik bhaskarचीनी के दाम कम होने की उम्मीद नहीं
Bhaskar Correspondent

जयपुर. महंगाई से परेशान आम आदमी को आयातित चीनी पर वैट हटाने से कोई राहत नहीं मिलेगी। व्यापार जगत से जुड़े व आम लोगों का कहना है कि डिमांड और सप्लाई के अंतर को जब तक कम नहीं किया जाएगा, तब तक महंगाई पर पार नहीं पाई जा सकती।



चीनी के भाव पिछले कुछ माह में 15 से 20 रुपए बढ़ गए। ऐसे में वैट हटाने से आयातित चीनी पर मात्र 2 रुपए की राहत देने की कोशिश है। सरकार ने वैट आयातित चीनी से हटाया है। ऐसे में देशी चीनी पर इसका असर नहीं पड़ रहा है। स्थिति यह है कि आमजन को तो फिर भी महंगी चीनी से ही वास्ता पड़ेगा।

राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार संघ के प्रदेश महामंत्री बाबूलाल गुप्ता का कहना है कि चीनी के भावों में कमी लाने के लिए सरकार को वैट हटाने के बाद तीन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए, जिससे 5 से 6 रुपए तक की राहत मिल सके। केंद्र सरकार चीनी मिल मालिकों को कोटा जारी होते ही डिलीवरी देने के निर्देश दे।



उत्तर प्रदेश में लगभग 5 लाख टन आयातित कच्ची चीनी का निस्तारण भी सरकार को तुरंत कराना चाहिए। फोर्टी के महामंत्री प्रेम बियानी का कहना है कि केंद्र सरकार डिमांड और सप्लाई के गैप कम करे, तो महंगाई पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। बंदरगाहों पर पड़े चीनी के भारी स्टॉक को बाजार में लाया जाना चाहिए।



राजस्थान फल सब्जी थोक विक्रेता महासंघ के अध्यक्ष राधेश्याम फाटक का कहना है कि पैदावार में लगातार हो रही कमी ही महंगाई का सबसे बड़ा कारण है। सरकार को किसानों से जमीन खरीदने के बजाय उन्हें पैदावार के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।



दो साल में दोगुने दाम



महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। बाजार में खाद्य वस्तुओं के भाव दो साल में ज्यादा बेकाबू हुए हैं। हालात ये है कि देसी घी जो दो साल पहले 160 रुपए तथा पिछले वर्ष 190 रुपए प्रति किलो तक में बेचा गया, उसके भावों ने आसमान छू लिया। शुक्रवार को कीमत 250 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक रही। यानी एक साल में ही भाव 30 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गए।



चीनी की कीमतें तो दो साल पहले के मुकाबले 100 प्रतिशत से ज्यादा हो गईं। दालों ने भी रसोई का बजट बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। इनके भाव 100 प्रतिशत से भी ज्यादा चढ़े। इस बीच सरसों की नियमित पैदावार के कारण सरसों के तेल के भावों में स्थिरता बनी रही। रसोई में कोई ऐसी वस्तु नहीं बची, जिसकी कीमतों में दो साल में भारी वृद्धि न हुई हो।

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