ई-आतंकवाद और हम
साइबर अपराधों को नियंत्रित करने के लिए समुचित कानून बनाने के केंद्र सरकार के हाल के प्रयास यकीनन बेहद सामयिक हैं। कुछ सप्ताह पहले ही तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने खुलासा किया था कि चीन के हैकरों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भेदने का प्रयास किया था। यह दिसंबर के आसपास की बात थी, जब यहां तक कि अमेरिका को भी चीन के साइबर हमलों का सामना करना पड़ा था। बड़े व्यापक पैमाने पर हो रहे ये संगठित हैकिंग ऑपरेशन आंख खोलने वाले हैं और दुनियाभर में विभिन्न देशों के सामने पेश आ रहे गंभीर खतरे की चेतावनी देते हैं। यदि इस ई-टेरोरिज्म (ई-आतंकवाद) को समय रहते नहीं रोका गया तो यह हमारे देश के लिए सीमा पार के आतंकवाद से भी कहीं अधिक भयावह साबित हो सकता है।
वैश्विक स्तर पर हैकर्स व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, मानवाधिकार समूहों और सरकारी एजेंसियों को निशाना बनाने में सफल रहे हैं। वर्ष 2007 में अमेरिका के पेंटागन की ई-मेल प्रणाली और वर्ल्ड बैंक की वित्तीय सूचना प्रणाली में साइबर घुसपैठ के पीछे चीनी हाथ की आशंका जताई गई थी। हैकर्स ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बराक ओबामा और मैक्केन के प्रचार अभियानों को भी साइबर हमलों का निशाना बनाया था। ये सारे घटनाक्रम साइबर आतंकवाद के भयावह खतरों की ओर इशारा करते हैं।
हमारे देश में इंटरनेट को आए कुछ ही दशक हुए हैं और इसने हमारी जिंदगी के सभी आयामों में क्रांतिकारी बदलाव ला दिए हैं। इसका दायरा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। इस प्रौद्योगिकी के फैलाव और बढ़ते इस्तेमाल ने साइबर अपराध सहित कई समस्याओं को भी जन्म दिया है। साइबर अपराधों में कई तरह की अवैध गतिविधियां शामिल हैं। इंटरनेट में गंभीर सुरक्षा चिंताओं के अलावा सांस्कृतिक और नैतिक खतरे उत्पन्न करने की भी प्रबल क्षमता होती है। शत्रु इसका इस्तेमाल परमाणु शक्ति के समान ही एक बहुत ही विध्वंसक हथियार के तौर पर कर सकता है।
आज आतंक ने ई-आतंकवाद के रूप में एक नया और अदृश्य चेहरा अख्तियार कर लिया है। यह आतंकवाद के उन सभी रूपों से कहीं अधिक घातक है, जिनका हम अब तक सामना कर चुके हैं। ऑनलाइन अपराध की घटनाएं आज सुर्खियां बनने लगी हैं और इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ने के साथ ही ऐसे अपराध भी बढ़ते जा रहे हैं। साइबर अपराध के जो पैटर्न उभर रहे हैं, वे इस बात की तस्दीक करने के लिए पर्याप्त हैं कि कंप्यूटर नेटवर्क का इस्तेमाल करके किसी भी बड़े औद्योगिक समूह या देश के कामकाज को पूरी तरह से ठप किया जा सकता है। साइबर अपराध से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा है, फिर चाहे वह बैंकिंग हो या रक्षा अथवा शिक्षा हो या अनुसंधान।
एक साइबर आतंकी साइबर स्पेस का इस्तेमाल करके कंप्यूटर आधारित हमलों से किसी भी सत्ता को भयभीत करने या उसे अपनी विचारधारा के अनुसार चलने को बाध्य करता है। ई-आतंकवाद इन दिनों आतंकित करने का एक बहुत ही दमदार हथियार बनता जा रहा है। 9/11 और इराकी युद्ध के बाद आतंकवादियों द्वारा इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इस पूरे मसले का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि हमारे यहां साइबर अपराधों का पता लगाने, उनकी पड़ताल करने और उनसे निपटने का कोई समुचित तंत्र ही नहीं है। कानून से संबंधित एजेंसियां इस विशेषज्ञ क्षेत्र में न तो विभिन्न साधनों से लैस हैं और न ही प्रशिक्षित।
हमारे कानून में अभी बहुत बदलाव किए जाने की जरूरत है, ताकि साइबर अपराधों को रोकने में उसे दक्ष बनाया जा सके। इसे इतना सक्षम बनाना होगा कि कोई भी साइबर अपराधी बच न सके और इसके दायरे में तमाम तरह के साइबर अपराधों को शामिल करना होगा। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशाल मानवीय संसाधनों और प्रौद्योगिकीय विकास की वजह से भारत की गणना एक प्रमुख आईटी ताकत के रूप में होती है, लेकिन यह बहुत ही दुखद है कि साइबर अपराधों को रोकने, उनके नियंत्रण और उनकी जांच-पड़ताल के मामले में यहां एक प्रभावी तंत्र का सख्त अभाव है।
साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक सुसज्जित और समुचित प्रशिक्षित सुरक्षा एजेंसी की जरूरत महसूस की जा रही है। वर्तमान में हमारी एजेंसियों द्वारा अधिकांश कार्य घटिया ई-मेलों, डाटा की चोरी और छोटे से लेकर मध्यम स्तरीय हैकिंग के मामलों में ही किया जा रहा है और वह भी केवल महानगरों में। ऐसे मामलों की संख्या भी बहुत कम है, जो किसी परिणति तक पहुंचते हैं। यह विडंबना ही है कि आईटी के मामले में दुनिया की अगुवाई करने वाला हमारा देश उस आधुनिक ई-आतंकवाद से निपटने में पूरी तरह से तैयार नहीं है, जो हमारी एकता व अखंडता के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरा है।
उल्लेखनीय है कि 9/11 की विध्वंसक घटना के बाद अमेरिका ने निजता जैसे गंभीर मामलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरोध को दरकिनार करते हुए एक बहुत ही सख्त कानून ‘द यूएस पेट्रॉइट एक्ट’ को लागू कर दिया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य अमेरिका को और अधिक सुरक्षित बनाना और भविष्य में 9/11 जैसी किसी भी संभावित घटना को रोकना था। आतंकवाद का सामना करने के लिए अमेरिकी कार्यपालिका और विधायिका की कार्रवाई वाकई बहुत ही प्रभावी थी। यह इन्हीं उपायों का परिणाम है कि 9/11 के बाद अमेरिका को किसी गंभीर हमले का सामना नहीं करना पड़ा है। हमारे देश को ऐसी ही रणनीति का अनुसरण करने की जरूरत है।
यह देखना सुखद है कि अब कम से कम केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम सक्रिय हुए हैं और अपने मंत्रालय की सफाई और उसमें फेरबदल करने में जुट गए हैं, जिसकी जरूरत काफी लंबे अर्से से महसूस की जा रही थी। राष्ट्रीय आतंकरोधी केंद्र (एनसीटीसी) का गठन, पंजीयन और विदेशियों की खोज के लिए आप्रवास नेटवर्क की स्थापना, सुरक्षा एजेंसियों के लिए संयुक्त व केंद्रीय रिपोर्टिग की व्यवस्था जैसे कदम उठाए गए हैं। हमारी चुनौतियों के मद्देनजर उन्हें अब भी बहुत कुछ करना बाकी है। उद्देश्य बिल्कुल साफ है : एक सुरक्षित माहौल का निर्माण।
हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र की सक्रिय भागीदारी से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी आतंकवाद, पैसे की उगाही और नशीले पदार्थो के खतरे से निपटने के लिए एक प्रभावी तंत्र का विकास कर सकी है। ई-आतंकवाद और साइबर अपराधों से निपटने के लिए भी ऐसे ही संगठित प्रयासों की जरूरत है। संकट के समय अचानक अतिसक्रिय होने की आदत से उबरने का वक्त आ गया है। चूंकि प्रौद्योगिकी हर समय बदलती रहती है। ऐसे में हमें सुनिश्चित करना होगा कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां बदलते जमाने के साथ स्वयं को ढाल सकें।
अचिन जाखड़ लेखक स्वेल्ट सिस्टम्स के सीईओ हैं।










