चौंक चौंक उठती है महलों की फ़िजा रात गए
चौंक चौंक उठती है महलों की फ़िजा रात गए
कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए
ये हक़ाइक़ की चट्टानों से तराशी दुनिया
ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुशबू
खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए
आओ हम जिस्म की शम्मों से उजाला कर लें
चांद निकला भी तो निकलेगा जरा रात गए
तू न अब आए तो क्या, आज तलक आती है
सीढ़ियों से तेरे क़दमों की सदा रात गए
मायने
फ़िजा=वातावरण
सदा=पुकार, आवाज़
हक़ाइक़= सच्चई, सत्यता
तराशी=काटी हुई
तिलिस्मों=जादू की
रिदा=चादर
बंद-ए-क़बा= अंगरखा
शम्मों=मोमबत्ती
सदा=पदचाप










