रानी
मास्टर जलाल दर्जी के बारे में मुझे मेरे दोस्त अल्लाह रखा ने बताया था और उसी दिन मुझे रिक्शे पर बिठाकर टकसाली दरवाजों की तरफ़ ले गया था। टकसाली दरवाजों के पास जाकर उसने रिक्शेवाले को अंदर एक सड़क की तरफ़ जाने का इशारा किया था। फिर एक ऐसी गली के मोड़ पर जाकर उसने रिक्शा रुकवाया, जिसका माहौल मुझे अजीब-सा लगा था। हमें रिक्शे से उतरते देखकर दोनों तरफ़ से कुछ अजीब-से आदमियों ने मायनाख़ेज नजरों से देखा और फिर एक भूरी मूंछों वाला आदमी, जो पान चबा रहा था, उसके मुंह से एक दांत चमक रहा था, जैसे सोने का हो और उसके कंधे पर एक परना था, पास आकर धीरे से कहने लगा, ‘मेरा नाम ही ख़ादिम नहीं, मैं ख़िदमत भी ऐसी करता हूं कि लोग मुझे हमेशा याद रखते हैं। आप हुक्म तो करो।’ मैं समझ गया कि वह कौन है और क्या कहना चाहता है?
मैंने उसे माथे पर त्योरी डालकर थोड़े-से स़ख्त लहजे में कहा, ‘मास्टर जलाल के पास कपड़े सिलवाने आए हैं और हमें..’
अभी मैंने बात पूरी भी नहीं की थी कि वह आदमी शर्मिंदी-सी हंसी हंसकर पीछे हो गया और कहने लगा, ‘हां चौधरी जी, मास्टर जलाल माहिर दर्जी है। आगे गली के अंदर उसकी दुकान है। मैं देखकर आया हूं, दुकान खुली है। आप चल जाओ।’ फिर अपने साथियों को पता नहीं उसने क्या इशारा किया, जो वे हमें कसाइयों की तरह देखने से हट गए।’
गली सड़क से कुछ ऊंची थी। दोनों ओर छोटे-छोटे हाल कमरे थे। हर कमरे की दहलीज में एक छोटा-सा थड़ा था। हर थड़े पर कोई कुर्सी, स्टूल या कोई पीढ़ी जैसी शै थी, जस पर कोई एक औरत बैठी हुई थी। कोई रेडियो की आवाज सैट कर रही थी, कोई रुमाल हाथ में लिए घुमा रही थी और किसी के हाथ में पंखी थी, जिसे बिना वजह ही हिलाए जा रही थी। उन औरतों को मैंने ग़ौर से देखा, मुझे वे सारी ही बीमार लगीं। बीमार चेहरों पर मेकअप पुता हुआ था। वह हर आदमी को देखकर झूठी हंसी हंसने की कोशिश करतीं। लेकिन उनके अंदर मुझे समुद्र से गहरी उदासियां और महरूमियां नजर आईं।
तीसरे-चौथे कमरे के दरवाजो में एक पचास-पचपन साल की औरत बैठी हुई थी। उसे खांसी लगी हुई थी और कुछ-कुछ देर बाद वह खांस रही थी। उसे कुछ सांस की बीमारी थी। एक उम्र ज्यादा होने के कारण और दूसरा बीमारी के कारण वह सबसे ज्यादा मायूस नजर आई। क़द-काठ बहुत था उसका। नयन-ऩक्श भी अच्छे ही थे। लगता था कि अपनी जवानी के दिनों में वह बहुत ख़ूबसूरत होगी। उसके दरवाजे के पास से गुजरते हुए एक अजीब सोच ने मेरे पांव रोक लिए। उसकी सेहत और हालत इतनी बुरी थी कि मेरी सोच ने मुझसे कहा, इसका अब कौन ग्राहक होगा?
किसके सहारे पर यह अब यहां बैठी है? मन किया कि उसके साथ कोई बात करूं। मैं उसे या कहकर बुलाता? मुझे तो उसका नाम भी पता नहीं था। इतने मे एक छोटी-सी बच्ची ने चावलों की थाली उसे पकड़ाते हुए कहा, ‘मौसी रानी, यह चावल गुलजरां ने भेजे हैं।’ मुझे पता चला, उसका नाम रानी है।
मैं सोचों के समुद्र में गोते लगाने लगा। बार-बार ख्याल आता, कभी यह भी किसी की बेटी होगी, किसी की रानी बाजी और किसी के दिल की रानी होगी। कभी इसे भी किसी सोलह साल के लड़के ने मेले से लाकर नग वाली अंगूठी प्यार की निशानी दी होगी।
कभी उसने भी रेशमी सूट से कपड़ा बचाकर, उसका रुमाल बनाकर उस लड़के को प्यार का जवाब दिया होगा। फिर दिल ने सोचा, किन-किन रास्तों को तय करके, किन-किन दरियाओं से तैरकर यह आज की मायूस रानी यहां तक पहुंची होगी? अच्छी उम्र जब यहां आई होगी, तो इसकी ग्राहकी होगी। कभी इसकी भी झील-सी आंखों में मनचले तमाशबीनों का दिल डूबने को करता होगा?
मेरी सोचों के पक्षी के बैठने के लिए कोई वृक्ष नहीं था। थोड़ी देर के लिए मेरे पैर उसके दरवाजे पर रुके। मैंने उसकी तरफ़ कई बार देखा, उसने भी मेरी तरफ़ कई बार नजर डाली। मुझे वह दुनिया जहान की बेबस और मजबूर औरत लगी। अब भी उसका कोई ग्राहक होगा? यह ख्याल एक बार फिर मेरे जेहन में उभरा। नहीं, अब इसका कोई ग्राहक नहीं हो सकता, मेरे दिल ने जैसे फैसला सुना दिया। फिर उसका गुजरा कैसे होता है? एक और सोच आई। भगवान पत्थर में कीड़े को भी रिजक पहुंचाता है। इस ख्याल ने मेरे सवाल का जवाब दे दिया।
मैंने जेब में हाथ डाला। दस-दस रुपए के दो नोट बग़ैर उसके साथ बात किए उसकी तरफ़ बढ़ाए। शरमाते-शरमाते उसने नोट तो पकड़ लिए, लेकिन एक बार उसने कह भी दिया, ‘जी रहने दो’, लेकिन मैं पैसे उसकी हथेली पर रखकर आगे चला गया। उसके मुंह से कुछ ल़फ्ज निकले, जो यक़ीनन दुआओं के होंगे।
जलाल दर्जी वाक़ई सलवार-कमीज सिलने का माहिर था।
उसके सिले हुए कपड़े पसंद आ गए, तो फिर हमेशा के लिए मैं उसका ग्राहक बन बया। एक बार कपड़े देने जाता और दूसरी बार सिले हुए कपड़े वापस लेने जाता। जितनी बार जाता, रानी को बीस रुपए जरूर दे आता। हर बार उसकी आंखों में हमदर्दी की एक चमक देखता।
कई बार वहां जाने के कारण उसकी गली की औरतें मुझे पहचानने लगीं थीं और सुर्ख़ी से पुते होंठों तथा सुरमें से भरी आंखों से इशारे करने से हट गई थीं।
कई बार मैंने एक-दूसरी को कहते सुना था, ‘यह तो कपड़े सिलवाने वाला चौधरी है।’
ईद वाले दिन मैं कपड़े सिलवाने गया, तो देखा कि रानी के कपड़े बहुत ख़स्ता हालत में थे। मैंने कपड़ों वाले लिफ़ाफ़े से क्रीम कलर का एक सूट निकालकर उसे दे दिया। (जारी)
अनुवाद- नव्यवेश नवराही










