सियासी पेच में गेहूं की फसल
कोटा. मध्यप्रदेश द्वारा उसके हिस्से का बचा हुआ पानी हाड़ौती के किसानों को देने से साफ इनकार करने के बाद चंबल सिंचित क्षेत्र में एक लाख हैक्टेयर से ज्यादा गेहूं की फसल पर बर्बादी का साया मंडरा गया है। दूसरी ओर नहरी पानी के लिए किए जा रहे किसान आंदोलन में इतना विलंब हो चुका है कि 15 फरवरी के बाद अगर पानी छोड़ा भी गया तो फसल को कोई फायदा नहीं होने वाला।
गेहूं की फसल को तीन से चार बार पानी चाहिए, लेकिन चम्बल सिंचित क्षेत्र में जब नहरों में पानी छोड़ा गया तो टेल एरिया में कई जगह एक पानी भी नहीं मिल पाया। चम्बल की नहरों में हाड़ौती के लिए 20 अक्टूबर को पानी छोड़ा गया था और 20 नवंबर तक नहरें चली थी। यह पानी रबी फसल में पलेवा के काम आया। इसके बाद फिर 10 दिसंबर को पानी छोड़ा गया जो 15 जनवरी तक चला। इससे हेड के किसानों को तो एक बार पानी मिल गया, लेकिन अंतिम से भी अंतिम छोर के किसान पानी से वंचित रहे।
उधर, चम्बल के जलाशयों में कम पानी होने से सीएडी प्रशासन ने किसानों से गेहूं की बुवाई नहीं करने की अपील की थी लेकिन चूंकि चम्बल सिंचित क्षेत्र में गेहूं की पैदावार अच्छी खासी होती है, इसलिए किसानों ने करीब एक लाख 25 हजार हैक्टेयर में गेहूं की बुवाई कर दी।
वजह यह है कि गेहूं की फसल में बालियां निकलना शुरू हो गया है और इस फसल को तत्काल पानी की जरूरत है। उधर, नहरों में पानी छोड़ने की मांग पर भाजपा के स्थानीय विधायक ओम बिरला, भवानीसिंह राजावत और बूंदी के विधायक अशोक डोगरा के नेतृत्व में 13 फरवरी को सीएडी कोटा कार्यालय के घेराव और इससे पूर्व 8 फरवरी को कोटा, बारां व बूंदी की अनाज मंडियां बंद रखने का आह्वान किया है। इससे सरकार पर कब कितना दबाव बनता है और नहरों में पानी छोड़ने का निर्णय लिया जा सकता है, यह सब संशय में है।
शुक्रवार को हुई किसानों की बैठक में भी किसान कह चुके हैं कि 15 फरवरी तक भी नहरों में पानी छोड़ दिया गया तो गेहूं की फसल को बचाया जा सकता है। इधर, राजस्थान और मध्यप्रदेश में पानी छोड़ने के मुद्दे का सकारात्मक हल निकल पाएगा, फिलहाल संभव नहीं लग रहा। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार को भी यह बात शायद ही रास आए कि नहरों में पानी छुड़वाने का श्रेय भाजपा ले जाए। गृहमंत्री शांति धारीवाल कह भी चुके हैं कि मप्र में भाजपा की सरकार है इसलिए आंदोलन कर रहे भाजपा नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को वहां के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान पर दबाव बनाकर नहरों में पानी छुड़वाना चाहिए। जबकि भाजपा विधायक बिरला और राजावत का कहना है कि मामला दो सरकारों के बीच का है इसलिए सरकारी स्तर पर ही बात होना चाहिए।
75 फीसदी उत्पादन का नुकसान
भारतीय किसान संघ के प्रदेश मंत्री जगदीश शर्मा का कहना है कि नहरों में तत्काल पानी नहीं छोड़ा गया तो चंबल सिंचित क्षेत्र में गेहूं के उत्पादन में 75 फीसदी का नुकसान होगा। पानी के बिना गेहूं की बालियों में दाने बहुत कम आएंगे और जो आएंगे वे अच्छी तरह पक नहीं पाएंगे। एक बीघा में जो 7-8 क्विंटल गेहूं की पैदावार होनी चाहिए, वह घटकर एक से दो क्विंटल ही रह जाएगी।










