कानून ही भूकंपरोधी इमारतों की राह में रुकावट
जयपुर. जवाहर कला केन्द्र में पिछले तीनदिनों से चल यंग आर्किटैक्ट्स फैस्टिवल में रविवार को भूकंपरोधी इमारतों के निर्माण से जुड़े कानून पर चर्चा की गई। बंगाल इंजीनियरिंग एंड साइंस यूनिवर्सिटी की प्रो डॉ कया मित्रा ने सैशन को शुरू करते हुए कहा कि हाऊसिंग प्रोजेक्ट्स में पार्किग की अनिवार्यता और एफएआर जैसे कानून सबसे बड़ी बाधा है।
इसे समझाते हुए कहती है कि प्लॉट एरिया में कारपार्किग का स्पेस निकालने के लिए कॉलम पर बिल्डिंग स्ट्रक्चर तैयार किए जा रहे है। विदेशों में होने वाले भूकंपरोधी निर्माण में कॉलम की जगह दीवारों को आधार बनाकर बिल्डिंग स्ट्रक्चर तैयार किया जाता है। हमारे यहां आमतौर पर बाल्कनी का भी प्रोजैक्शन कर लिया जाता है। इसके लिए हमे बिल्डिंग निर्माण में पार्किग की जगह को प्रोजेक्शन से बाहर रखने की जरूरत है।
कॉम्पिटेंस के आधार हो आर्किटैक्ट का चयन
देशभर में बनाई जा रही इमारतों में इस समय स्ट्रक्चर तौर पर किसी तरह की कमी नहीं हैं। सभी बिल्डिंग्स कानूनी दायरें में बनाई जा रही है। आर्किटैक्ट नेहा बंसल कहती है कि बड़े प्रोजेक्ट्स में निर्माण में जो खामिया रहती है उसकी वजह अधिकारियों द्वारा आर्किटैक्ट की रिपोर्ट का जमीनी तौर पर निरीक्षण ना करवाना। आमतौर पर अनुभव और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर ही आर्किटैक्ट को प्रोजेक्ट के लिए चयन होता है।
लागू हो ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट
इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटैक्ट की फैकल्टी प्रो मोना सी आनंद ने बताया कि ग्लोबल वॉमिंग को कम करने के लिए ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट को लागू किया जाए। इस कॉन्सेप्ट से 40 प्रतिशत तक कॉर्बन उत्र्सजन को कम किया जा सकता है।
इस कॉन्सेप्ट में बनने वाली बिल्डिंग में लॉकल एरिया से ही बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का 50 से 60 प्रतिशत मैटेरियल काम में लिया जाता है। इससे साइट के आसपास एरिया में एम्पलॉयमेंट भी जनरैट होता हे। अभी ये कॉन्सेप्ट गुजरात और मुंबई में सफलता पूर्वक संचालित किए जा रहे है।










