वर्षा आधारित कृषि में बदलाव की जरूरत विश्व बैंक
शिमला. आधुनिक कृषि तकनीक होने के बावजूद प्रदेश में आज भी खेती बारिश पर निर्भर करती है। विश्व बैंक ने प्रदेश में परंपरागत खेती पर सवाल उठाए हैं। सरकार को सलाह दी है कि वष्र पर आधारित कृषि को बदलने की जरूरत है और कृषि क्षेत्र को मनरेगा से जोड़ा जाए।
विश्व बैंक राज्य को मिड हिमालय प्रोजेक्ट के माध्यम से 500 करोड़ रुपए की सहायता दे चुका है। इसके अतिरिक्त सिंचाई परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक बड़ा सहयोगी रहा है। विश्व बैंक ने खेती को सिंचाई सुविधाओं से जोड़ने को कहा है ताकि आर्थिक सहायता का लाभ किसान तक पहुंच सके। हाल ही में विश्व बैंक की टीम ने प्रदेश के दौरे के बाद सरकार को कृषि क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए टिप्स दिए हैं।
प्रदेश सरकार ने शीघ्र कृषि क्षेत्र में विश्व बैंक के सुझावों का अनुसरण नहीं किया तो यहां से विभिन्न क्षेत्रों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर असर पड़ सकता है।
मौसम में आए बदलाव के कारण प्रदेश में पिछले दो साल से पड़ रहे सूखे ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। अभी तक डेढ़ माह से अधिक का समय सूखे में गुजर गया है। राज्य में कृषि उत्पादकता दो फीसदी से कुछ अधिक है। विश्व बैंक ने सरकार को माइक्रो सिंचाई सिस्टम अपनाने को कहा है। वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. केआर धीमान ने कहा कि अभी 13 फीसदी वर्षा पानी का इस्तेमाल हो पाता है। यदि 5 फीसदी वर्षा पानी का दो घंटे तक रोक लिया जाए तो भूमिगत जल स्रोत रिचार्ज होंगे। इसका लाभ कृषि और बागवानी गतिविधियों को होगा।
सरकार ने 13वें वित्त आयोग को भेजे गए प्रस्ताव में कृषि क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां बताई हैं। सिंचाई की पर्याप्त सुविधाए नहीं होने से फसल पैदावार राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। राज्य सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए 353 करोड़ रुपए की योजना शुरू की है, इसमें करीब 125 करोड़ रुपए पॉलीहाऊस और माइक्रो सिंचाई के लिए रखे हैं। दिसंबर 2009 में मुख्यमंत्री धूमल ने उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ इजरायल का दौरा किया था। इस दौरान रेनवाटर हारवेस्टिंग के लिए दोनों में सहयोग करने की इच्छा जाहिर की थी।










